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प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)

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प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)

प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)

प्राकृतिक संसाधनों के अन्तर्गत उन सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है जो भौतिक पर्यावरण (Physical Environment) में मौजूद हैं और जिन पर मानव किसी-न-किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए निर्भर करता है. इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से भूमि संसाधन, वन संसाधन, खनिज संसाधन और ऊर्जा संसाधन का अध्ययन किया जाता है.

प्राकृतिक संसाधन और आर्थिक विकास

क्लासिकल अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न क्षेत्रों के विकास की व्याख्या उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की थी. इन्होंने ह्रासमान प्रतिफल नियम (Law of Diminishing Returns) की अवधारणा भी दी थी, जिसके अनुसार अन्ततोगत्वा प्राकृतिक संसाधनों की कमी भयंकर रूप ले लेगी और आर्थिक प्रगति में बाधा पहुंचायेगी. आधुनिक अर्थशास्त्री, जबकि प्रत्येक क्षेत्र में नयी-नयी वैज्ञानिक विधियों से काम हो रहा है, प्राकृतिक संसाधनों को ज्यादा महत्व नहीं देते. दरअसल दोनों विचारधाराओं का अलग-अलग देशों की विभिन्न आर्थिक पद्धतियों में महत्व है. जैसे कि एक पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था में भूमि और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की आज भी महत्वपूर्ण भूमिका है जबकि विकसित देशों को इनके अभाव में भी कोई अन्तर नहीं पड़ता. आर्थिक विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों के महत्व में होने वाली कमी मुख्यतया दो कारणों से होती है. पहला, कृषि वस्तुओं की आय मांग लोच (Income Elasticity of Dernand) कम होने के कारण उन पर किया जाने वाला व्यय आर्थिक विकास के दौरान कुल व्यय के अनुपात के रूप में कम हो जाता है. इसलिए प्राकृतिक संसाधनों की मानव जीवन में भूमिका कम हो जाती है. दूसरा, विकास के साथ तकनीक में लगातार सुधार होते हैं और ऐसी नयी विधियों का पता चलता है जिनमें भूमि और अन्य प्राकृतिक साधनों के स्थान पर श्रम व पूँजी का प्रतिस्थापन संभव होने लगता है.

भूमि संसाधन

सभी प्राकृतिक संसाधनों के भूमि सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. मानव तथा अन्य जीव-जन्तु इस पर निवास करते हैं. खेती और कारखानों की स्थापना भूमि पर होती है. सड़कें, नहर आदि भूमि पर बनाये जाते हैं. वन सम्पदा को बढ़ाने तथा तथा चारगाह के विकास के लिए भूमि की आवश्यकता पड़ती है. अतः भूमि की स्थिति, उपयोग आदि के बारे में जानना आवश्यक है.

भारत में भूमि का क्षेत्र-फल और उपयोग :

विश्व के देशों में भारत का क्षेत्रफल के हिसाब से सातवाँ तथा जनसंख्या के हिसाब से दूसरा स्थान है. भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32 करोड़ 87 लाख हेक्टेयर है. जिसमें से 30 करोड़ 46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के लिए आंकड़े उपलब्ध हैं. वनों के अधीन 6 करोड़ 70 लाख हेक्टेयर है. वर्तमान में लगभग 4.1 करोड़ एकड़ भूमि खेती के लिए उपलब्ध नहीं है. इस वर्ग में दो प्रकार की भूमि शामिल है : (i) ऐसी भूमि जो गैर कृषि उद्देश्यों के लिए काम में लाई जाती है तथा (ii) ऊसर व अकृष्य भूमि.

भारत में 1950-51 में गैर कृषि उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भूमि 93 लाख हेक्टेयर थी जो 1987-88 में बढ़कर 1 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गयी. 1950-51 में अकृष्य भूमि 2 करोड़ 30 लाख हेक्टेयर थी जो 1987-88 में 1 करोड़ 70 लाख हैक्टेयर रह गयी. योजनाकाल में कृषि के अधीन भूमि में काफी वृद्धि हुई है. 1950 में शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net Area Sown) 11 करोड़ 87 लाख हेक्टेयर था जो 1995-96 में बढ़कर 142. 2 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया. भविष्य में और अधिक भूमि को कृषि के अधीन लाने के आसार नजर नहीं आते. इसलिए उस भूमि पर जहाँ फिलहाल एक ही फसल उगाई जाती है ऐसे प्रयास करने होंगे कि एक से अधिक फसलें उगाई जा सकें.

भूमि उपयोग का अव्यवहार्य ढांचा :

यद्यपि 1951 में योजनाबद्ध विकास को अपनाया गया था, लेकिन भूमि उपयोग के सम्बन्ध में आज तक कोई कारगर योजना नहीं बनाई गई है. स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की कृषि पिछड़ी हुई थी. शोषणकारी भूमि संबंधों के कारण उत्पादक शक्तियों का विकास नहीं हो पा रहा था. तब स्वाभाविक था कि वनों का सफाया करके अधिक भूमि को कृषि के अधीन लाया गया, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा.

बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में खाद्यान्नों की मांग भी बढ़ती रहेगी. इसलिए कृषि के अधीन और अधिक भूमि को लाने का दबाव बना रहेगा. वर्ष 2000 में भूमि की मांग 42 करोड़ 68 लाख हेक्टेयर के आसपास थी, किन्तु भारत का कुल क्षेत्रफल ही 32 करोड़ 88 लाख हेक्टेयर है. अतः इस बात को ध्यान में रखते हुए भूमि के उपयोग के सम्बन्ध में उचित आयोजन करने की आवश्यकता है.

प्रस्तावित सुझाव :

अमेरिका और यूरोप के अन्य देशों की तुलना में भारत में कृषि के अधीन भूमि का कुल उपलब्ध भूमि से अनुपात बहुत अधिक है. गैर कृषि उद्देश्यों के लिए भूमि की आवश्यकता और पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखते हुए और अधिक भूमि को कृषि के अधीन लाना उपयुक्त नहीं होगा. इसलिए उसी भूमि पर एक से अधिक फसलें (Crops) उगाने का प्रयास किया जाना चाहिए. देश में जल-साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. अतः सिंचाई सुविधाओं का प्रसार कर जल का उचित प्रबन्धन एवं नियमन किया जाए. चारागाहों के लिए अकृषित भूमि (Uncultivated Land) का इस्तेमाल तथा ‘दोहरे उद्देश्य’ (Double Purpose) वाली ऐसी फसलों का उत्पादन भी बढ़ाना होगा जो पशुओं के लिए चारा उप-उत्पादन के रूप में प्रदान करती हैं. इस प्रकार भूमि-उपयोग ढांचा विकसित करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. इसके लिए दीर्घकालीन तथा अल्पकालीन आयोजन की आवश्यता है.

वन संसाधन

किसी भी राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों में वनों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है. भारत में वनों के अधीन कुल 6 करोड़ 37 लाख हेक्टेयर भूमि है जो कुल क्षेत्र का लगभग 20.69 प्रतिशत है. 1952 में राष्ट्रीय वन-नीति प्रस्ताव में कहा गया कि भारत में कुल भौगोलिक क्षेत्र के एक तिहाई हिस्से में वन होने चाहिए. इस लक्ष्य को 1988 की राष्ट्रीय वन-नीति में पुनः अनुमोदित (Reiterated) किया गया है. वैज्ञानिकों का मत है कि भारतीय दशाओं में पर्वतीय प्रदेशों के 60 प्रतिशत भूमि और मैदानों के 20 प्रतिशत भूमि पर वन होना आवश्यक है. लेकिन चिन्ता का विषय यह है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव के कारण पिछले 42 वर्षों में लगभग 45 लाख हेक्टेयर वन भूमि को विभिन्न कार्यों के लिए इस्तेमाल में लाया जा चुका है. वर्ष 1997-99 के दौरान 3,896 वर्ग कि.मी. वन क्षेत्र की बढ़ोत्तरी हुई है.

देश के विभिन्न भागों में वनों के प्रतिशन में काफी भिन्नताएं हैं. अतः जिन क्षेत्रों में वनों की कमी है उन क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से वृक्ष उगाने के कार्यक्रम अपनाने की आवश्यकता है.

वनों से लाभ

राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में वनों का महत्वपूर्ण स्थान होता है. वनों से मानव को अनेक प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ है : .

प्रत्यक्ष लाभ :

वनों का राष्ट्रीय आय में लगभग 1 प्रतिशत योगदान है. इस उद्योग में 1 लाख व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से रोजगार में तथा 3 लाख अपनी आजीविका के लिए वनों पर आश्रित हैं. वन 3 करोड़ से अधिक पशुओं को चारा प्रदान करते हैं. मुख्य वन उत्पादन औद्योगिक और ईंधन लकड़ी हैं. वनों से अनेक छोटी-छोटी वस्तुएं भी प्राप्त होती हैं जिन पर भारत के विभिन्न लघु उद्योग आधारित हैं.

परोक्ष लाभ :

वन पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं. वर्षा करवाने में मदद करते हैं. वर्षाकाल में भारी मात्रा में पानी सोख लेते हैं, जिससे भूमिगत जलस्तर ऊँचा बना रहता है. वन भूमि का कटाव भी रोकते हैं साथ ही बाढ़ नियंत्रण में सहायक होते हैं. संक्षेप में वन राष्ट्र की अमूल्य सम्पदा है.

सरकार की 1952 की वन-नीति :

स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने 13 मई, 1952 की अपनी वन-नीति घोषित की. इसके अन्तर्गत सरकार ने अपना यह निश्चय किया कि देश के समस्त क्षेत्रफल के एक-तिहाई भाग में वन होने चाहिए. पर्वतीय क्षेत्र के 60 प्रतिशत तथा मैदानी क्षेत्र के 20 प्रतिशत भू-भाग पर वन लगाने का निश्चय किया गया. 1952 की वन-नीति की मुख्य बातें इस प्रकार हैं

(i) भूमि का संतुलित उपयोग कर अधिकतम उत्पादन.

(ii) पर्यावरण सुधार के लिए वृक्षारोपण,

(iii) राजस्थान में मरुस्थल (Desert) के विस्तार को नियंत्रित करना तथा नदियों द्वारा भूमि-क्षरण (Soil Erosion) को वनरोपण द्वारा भूमि-क्षरण को वनरोपण द्वारा रोकना,

(iv) चारागाह (Grazing fields) और लकड़ी प्राप्त करने के उद्देश्य से वनों को विकसित करना.

(v) इमारती, यातायात तथा उद्योगों में प्रयोग होने वाली लकड़ी की पूर्ति बढ़ाना.

(vi) निजी वनों को सरकारी नियंत्रण में लाकर उनकी स्थिति में सुधार करना.

वानिकी के कार्यक्रम :

1952 की वन-नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से सरकार ने कई कदम उठाये हैं. सबसे महत्वपूर्ण वृक्षारोपण कार्यक्रम है. 1952 की वननीति घोषित होने के बाद तीन दशकों में राज्य सरकारों ने विभिन्न वनरोपण कार्यक्रमों के अन्तर्गत 34 लाख हेक्टेयर भूमि पर वृक्ष आरोपित किए. वन विकास कार्यों हेतु वित्त की जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में 16 स्वायत्त वन विकास निगम (Forest Development Corporation) स्थापित किए गए है. वानिकी क्षेत्र में शोध कार्य को स्वीकार करते हुए देहरादून में वन शोध संस्थान व कॉलेज (Forest Research Institute and College) की स्थापना की गई है.

देश के आर्थिक विकास में वनों के महत्व को देखते हुए सरकार कृत-संकल्प है कि इस सदी के अन्त तक देश का एक-तिहाई क्षेत्र वनों के अधीन ले लिया जाएगा. योजना आयोग का विश्वास है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (National Rural Employment Programme) में वृक्षारोपण कार्यक्रम अपनाने से वनों का अधःपतन (Degradation) रोका जा सकेगा. साथ ही विकास के लिए आवश्यक पर्यावरण आधारित ढाँचा (Ecological Infrastructure) तैयार हो सकेगा.

1988 की वन-नीति

1988 में सरकार ने संशोधित वन-नीति की घोषणा की. इसके उद्देश्य

निम्न हैं –

  1. पर्यावरण संतुलन एवं स्थिरता बनाये रखना,
  2. प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण,
  3. रेगिस्तान के विस्तार को रोकना,
  4. विभिन्न कार्यक्रमों के तहत वनों का विस्तार करना,
  5. राष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वनों की उत्पादकता को बढ़ाना और
  6. वन-नीति के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यापक जन-आंदोलन तैयार करना.

खनिज संसाधन

खनिज पदार्थों की उपलब्धि देश के आर्थिक विकास को प्रभावित करती है. आर्थिक विकास के आधार माने जाने वाले उद्योग जैसे : लोहा व इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट, कोयला, पेट्रोलियम तथा उर्वरक आदि हैं. दूसरे अधिकतर उद्योगों का विकास इन उद्योगों के विकास से सीधा जुड़ा होता है.

देश के खनिज संसाधन :

देश में खनिज सम्पदा को प्रायः तीन श्रेणियों में बांटा जाता है—प्रथम श्रेणी में वे खनिज पदार्थ जो देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं-लोहा, मैंगनीज, अभ्रक, क्रोमाइट आदि. दूसरी श्रेणी में वे खनिज पदार्थ जिसमें देश आत्मनिर्भर है-कोयला, नमक, बाक्साइट, चूना आदि . तीसरी श्रेणी में वे खनिज पदार्थ आते हैं जो देश की आवश्यकता की दृष्टि से अपर्याप्त हैं, जिनका आयात करना पड़ता है-तांबा, पेट्रोलियम, सीसा, निकिल, पारा आदि मुख्य हैं. सरकार ने नए खनिज भंडारों का पता लगाने के लिए अनेक संस्थानों की स्थापना की है, जिनके शोध कार्य से खनिज सम्पदा के बारे में नई जानकारियां प्राप्त हो रही हैं.

कच्चा लोहा :

भारत में कच्चे लोहे के विशाल भंडार हैं. विश्व के 6.6 प्रतिशत लोहे के भंडार भारत में हैं. इसका विदेशों को निर्यात (Export) भी किया जाता है. 1992-93 में कच्चे लोहे का उत्पादन 5.23 करोड़ टन था. इस्पात की बढ़ती घरेलू मांग तथा निर्यात आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 1999-2000 में कच्चे लोहे के उत्पादन का लक्ष्य 73,475 टन हुआ.

लौह-मिश्रधातु :

लौह-मिश्रधातु वे धातुएं हैं जिनका प्रयोग इस्पात बनाने में लोहे के साथ मिलाकर करना पड़ता है. इनमें मुख्य हैं-मैंगनीज, निकल, क्रोमाइट, कोबाल्ट आदि. इनमें से अधिकतर देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं.

अलौह-खनिज :

औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण अलौह खनिज हैं-तांबा, जस्ता, एल्युमिनियम, सीसा और टिन. यूरेनियम और थोरियम का परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में महत्व है. सोना व चांदी मूल्यवान धातु खनिज हैं. भारत में इन धातुओं के भंडार कम हैं, इसलिए देश को इनका आयात करना पड़ता हैं.

सरकारी-नीति :

खनिज के साधन अनवीकरणी (Non-Renewable) हैं, इसलिए इनका अंधाधुंध निष्कर्षण (Extraction) और निर्यात देश के दीर्घकालीन हितों के प्रतिकूल हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ‘जियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ (Geological Survey of India) की स्थापना की.

सरकारी नीति के दो पहलू-प्रथम, सरकार ने खनिज पदार्थों के खोज कार्य पर जोर दिया है. द्वितीय, खनिज संपदा के संरक्षण (Conservation) पर उचित ध्यान दिया गया है.

ऊर्जा संसाधन

देश के विकास के साथ-साथ ऊर्जा की मांग और उपयोग भी बढ़ता जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्पादक गतिविधियों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है. यही कारण है कि विकसित देशों में ऊर्जा की प्रतिव्यक्ति खपत अल्पविकसित देशों की अपेक्षा बहुत अधिक है. भारत में कुल ऊर्जा खपत में से लगभग 41 प्रतिशत गैर-वाणिज्य साधनों से तथा बाकी हिस्सा वाणिज्य ऊर्जा का है. वाणिज्य ऊर्जा के उपभोग में देश अधिकांशतः पेट्रोलियम पर निर्भर है.

विद्युत-शक्ति :

विद्युत शक्ति या बिजली वाणिज्य-ऊर्जा का एक मुख्य साधन है. 1990-91 में देश के कुल वाणिज्य-ऊर्जा उपयोग में बिजली का हिस्सा 17.6 प्रतिशत था. भारत ने स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में काफी विकास किया है. 1950 में देश में बिजली उत्पादन क्षमता केवल 2,300 M.W.थी जो मार्च 2002 में बढ़कर 10,4917.50 M.W. हो गई. इसके बावजूद बिजली की मांग की तुलना में पूर्ति में घाटा बना हुआ है. विद्युत-शक्ति की कमी को देखते हुए इसके विकास के लिए कई कदम उठाये गये हैं.

कोयला :

कोयला भारत में ऊर्जा का एक मुख्य साधन है. 1992 में अनुमान है कि देश में कोयले के भंडार 19,602 करोड़ टन थे. देश में बिजली के कुल उत्पादन में इनका हिस्सा 70 प्रतिशत है. कोयला क्षेत्र के विकास हेतु पिछले तीन दशकों में काफी शोध व अन्वेषण किये गये, लेकिन वांछित सफलता नहीं मिल पायी है. इसलिए 1971-73 में कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया है.

1973-74 में तेल संकट के कारण पहली बार कोयले के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई. फ्यूल पालिसी कमेटी (Fuel Policy Committee) ने प्राथमिकता के आधार पर कोयला उद्योग के विकास पर जोर दिया. चौथी योजना में कोयले के लिए 110 करोड़ रुपये की तुलना में पांचवी योजना में 1,025 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी. योजना के प्रथम दो वर्षों में कोयले का उत्पादन 2.2 करोड़ टन बढ़ गया. 1989-90 में कोयले का उत्पादन 21.37 करोड़ टन था, जो 1989-93 में बढ़कर 23.83 करोड़ टन हो गया. 2000-2001 में कोयले का कुल उत्पादन 30 करोड़ 96 लाख टन हुआ.

तेल और गैस :

औद्योगिकीकरण और परिवहन के परिणामस्वरूप भारत में पेट्रोलियम के भंडार सीमित होने के बावजूद इसके उपयोग में लगातार वृद्धि होती गई है. 1990-91 में वाणिज्य ऊर्जा की मांग का लगभग 43.4 प्रतिशत इससे प्राप्त हुआ था. पेट्रोलियम के घरेलू भंडारों का पता लगाने के लिए 1955 में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (Oil and Natural Gas Commission) तथा 1959 में ऑयल इण्डिया लिमिटेड (Oil India Limited) की स्थापना की गयी. इन प्रयासों के उत्साह-वर्द्धक परिणाम हुए. 1950-51 में तेल का उत्पादन मात्र 2.5 लाख टन था जो 2001-2 में 320.3 लाख टन हो गया.

भारत के पास विश्व के गैस भंडारों का केवल 0.5 प्रतिशत था. 1984-85 में भारत में 7.23 अरब घन-मीटर गैस का उत्पादन हुआ था, जो 1992-93 में 18.1 अरब घन-मीटर तक पहुंच गया. 2001-02 में 29.60 अरब घन मीटर उत्पादन हुआ. इस संभावना को देखते हुए अन्य तेल उत्पादों की जगह गैस के प्रयोग पर जोर दिया जाना चाहिए.

 

ऊर्जा का संकट

1973 में तेल निर्यातक देशों ने तेल की कीमतों में अकस्मात् चार गुना से अधिक वृद्धि कर दी थी, जिससे देश के सामने एक भयानक ऊर्जा संकट (Energy Crisis) पैदा हो गया था. 1973 से 1993 के बीच तेल की कीमतों में अनेक बार भारी वृद्धि हुई. स्वाभाविक है कि इससे भुगतान शेष पर . अप्रत्याशित दबाव पड़ा. अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज की जा रही है. देश में व्याप्त मौजूदा ऊर्जा संकट के मुख्य पहलू निम्न हैं –

  1. बढ़ती हुई तेल की कीमतें और स्फीतिक प्रवृत्तियां.
  2. खनिज तेल पर बढ़ता हुआ आयात व्यय.
  3. सभी वाणिज्य ईंधनों में मांग-आपूर्ति, असंतुलन, आदि .

ऊर्जा युक्ति :

तेल की कीमतों में वृद्धि होने से सरकार एवं योजना. आयोग को ऊर्जा युक्ति पर पुनर्विचार करना पड़ा. इस नई युक्ति के मुख्य . तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. घरेलू परम्परागत ऊर्जा स्रोतों (जैसे खनिज तेल, कोयला, जल विद्युत . व परमाणु शक्ति) के उत्पादन में वृद्धि,
  2. खनिज तेल की मांग का नियमन,
  3. ऊर्जा संरक्षण,
  4. ऊर्जा-वानिकी तथा बायो-गैस जैसे नवीनतम ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन और
  5. नई विकसित हो रही ऊर्जा तकनीकों के बारे में अनुसंधान और  विकास कार्यक्रमों की गति को तेज करना.

इसका अर्थ यह है कि यदि तेल की आपूर्ति की कमी का आर्थिक विकास पर दुष्प्रभाव रोकना है तो यह आवश्यक है कि आयातित खनिज तेल पर निर्भरता में कमी को हमें अपनी विकास युक्ति में महत्त्वपूर्ण स्थान देना होगा.

ऊर्जा स्रोत और उनका दोहन :

घरेलू उपलब्धि के हिसाब से कोयला भारत में वाणिज्य ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण साधन है. भारत में कोयले के प्रमाणित भंडार (Proven Reserves) 19,602 करोड़ टन हैं. देश में खनिज . तेल तथा गैस के भंडार सीमित हैं जो क्रमशः 70.9 करोड़ टन तथा 47.7 करोड़ टन हैं. जल विद्युत संभाव्य 75,400 M.W. है. 2001-02 तक इसमें से केवल लगभग 33 प्रतिशत का ही प्रयोग किया जा सका है. परमाणु ऊर्जा के लिए थोरियम तथा यूरेनियम के भंडार क्रमशः 363,000 टन तथा 34,300 टन है, जिनमें से केवल 50 प्रतिशत का ही दोहन संभव लगता है. इस सब के बावजूद भारत में प्रतिव्यक्ति भंडार अन्य देशों की तुलना में काफी कम हैं.

जहां भारत में प्रतिव्यक्ति कोयले के भंडार 201 टन हैं, वहीं अमेरिका में. 13,747 टन तथा चीन में 1,060 टन हैं. प्रतिव्यक्ति खनिज तेल के भारत में भंडार मात्र 0.98 टन हैं जबकि रूस में 34.83 टन, अमेरिका में 16.32 टन तथा चीन में 2.86 टन हैं.

पिछले लम्बे समय से ऊर्जा की कमी औद्योगिक विकास में मुख्य बाधक सिद्ध हुई है. खनिज तेल की बढ़ती कीमतों ने भुगतान शेष का संकट पैदा कर दिया है. इन बातों को ध्यान में रखते हुए आगे आने वाले समय में घरेलू ऊर्जा साधनों के और व्यापक दोहन की आवश्कता है.

ऊर्जा-संरक्षण और तेल की मांग का नियमन :

बिजली की संचारण और वितरण प्रणाली में दोषों के कारण तथा उद्योगों में अनार्थिक आकार वाली इकाइयों और अत्यन्त पुरानी टेक्नोलॉजी (Technology) के प्रयोग के कारण ऊर्जा का अपव्यय होता है. इस अपव्यय को उचित ऊर्जा आयोजन द्वारा रोका जा सकता है. अब आयोजकों का विश्वास है कि- “वैकल्पिक ऊर्जा, ऊर्जा की बचत का सबसे सस्ता साधन है.”

देश के सीमित तेल संसाधनों तथा खनिज तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, जहाँ कहीं भी संभव हो खनिज तेल के स्थान पर कोयला और जल-विद्युत का प्रतिस्थापन किया जाना चाहिए साथ ही पेट्रोलियम का कम-से-कम उपभोग करने का प्रयास करना चाहिए.

दीर्घकालीन ऊर्जा आयोजन और भविष्य के लिए ऊर्जा यक्ति .

पिछले तीन दशकों में अनेक विशेषज्ञ समितियों जैसे भारतीय ऊर्जा सर्वेक्षण सीमित (1965), ईंधन नीति समिति (1974), और ऊर्जा विषयक सलाहकार दल (1983-88) ने एकीकृत दीर्घकालीन ऊर्जा आयोजन की आवश्यकता पर जोर दिया. अतः योजना-आयोग ने विभिन्न क्षेत्रों की ऊर्जा सम्बन्धी दीर्घकालीक मांग तथा दीर्घावधि में ऊर्जा की आपूर्ति व्यवस्था अनुकूल करने के बारे में अध्ययन किये हैं. प्रारम्भिक पंचवर्षीय योजनाओं में ऊर्जा आयोजन के दीर्घकालीन पक्षों पर कम ध्यान दिया गया था. सातवीं योजना में नए और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास के बारे में स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाया गया था. आठवीं योजना में ऊर्जा के दीर्घकालिक एकीकृत आयोजन पर जोर है और यह माना गया है कि ऊर्जा समस्या के समाधान के लिए ऊर्जा की दीर्घकालिक आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ उसके उपभोग में किफायत करना भी आश्यक है. आठवीं पंचर्वीय योजना में इस दृष्टि में अल्पकालिक, मध्यकालिक

और दीर्घकालिक प्राथमिकताएं निर्धारित की गई हैं :

अल्पकालिक प्राथमिकताएं :

  1. ऊर्जा क्षेत्र में विद्यमान परिसम्पत्ति से अधिकाधिक प्रतिफल प्राप्त करना,
  2. सभी प्रकार की ऊर्जा के उत्पादन, परिवहन तथा उपयोग में होने वाली तकनीकी हानियों को कम करने के लिए उपाय करना,
  3. ऊर्जा के रक्षण और मांग प्रबन्ध को उपयुक्त संगठनात्मक एवं राजकोषीय नीतियों के द्वारा प्रोत्साहन देना,
  4. ऊर्जा की मांग को स्वदेशी स्रोतों से यथासंभव पूरा करना.

मध्यकालिक प्राथमिकताएं :

  1. पेट्रोलियम उत्पादों के स्थान पर कोयले, प्राकृतिक गैस और बिजली के उपयोग को बढ़ाने के उपाय करना,
  2. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का तेजी के साथ विकास करने के उपाय करना,
  3. नवीकरणीय स्रोतों पर आधारित विकेन्द्रीकृत ऊर्जा टेक्नोलॉजी के विकास के लिए शोध एवं विकास प्रयासों को बढ़ावा देना और
  4. ऊर्जा क्षेत्र में आत्म-निर्भरता लाने के लिए उपाय करना.

दीर्घकालिक प्राथमिकताएं :

  1. ऊर्जा के मुख्य नवीकरणीय स्रोतों पर आधारित ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली को विकसित करना और
  2. ऊर्जा के उत्पादन, परिवहन और उपयोग सम्बन्धी इस तरह की टेक्नोलॉजी का विकास करना जो पर्यावरण को प्रदूषित न करे और साथ ही लागत कुशल हो.

ऊर्जा सम्बन्धी उपर्युक्त तथ्यों से वर्तमान ऊर्जा समस्याओं का एक हद तक समाधान होगा. जिसके फलस्वरूप अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में विकास के लिए अधिक अवसर मिलेंगे.

भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (Nature of the Indian Economy)

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