Home / Government schemes / व्यावसायिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तनन होने के कारण

व्यावसायिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तनन होने के कारण

व्यावसायिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तनन होने के कारण

व्यावसायिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तनन होने के कारण

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि कुछ छोटे-मोटे परिवर्तनों के अतिरिक्त भारत में व्यावसायिक संरचना पिछले कुछ दशकों से अपरिवर्तनीय रही है. इसके बावजूद योजनाओं के दौरान शुद्ध राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति

आय में वृद्धिकर पाने में सफलता पाई है. परन्तु फिर भी व्यावसायिक संरचना में मूलरूप से कोई परिवर्तन नहीं आया है. इसके निम्नलिखित कारण हैं. विभिन्न विकसित देशों में आर्थिक इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि उनकी व्यावसायिक संरचना में जो आमूल परिवर्तन हुए, उसके तीन मुख्य कारण थे-जनसंख्या वृद्धि की दर में तेजी के साथ कमी, कृषि क्षेत्र की श्रम उत्पादकता में वृद्धि तथा उद्योगों का तेजी के साथ विकास. भारत में पिछले तीन-चार दशकों में इनमें से कोई भी कारक मौजूद नहीं था. प्रथम, परिवार नियोजन के तमाम कार्यक्रमों के बावजूद जनसंख्या वृद्धि की दर 2.14 प्रतिशत प्रतिवर्ष से अधिक बनी रही और जन्मदर 1991 में भी 30.0 प्रतिहजार पर टिकी रही.

द्वितीय, व्यावसायिक संरचना में परिवर्तन लाने की दृष्टि से कृषि में श्रम की उत्पादकता को बढ़ाया जाना आवश्यक है, क्योंकि केवल इसी स्थिति में अतिरिक्त श्रम शक्ति को दूसरे व्यवसायों में भेजा जा सकेगा. इसी के फलस्वरूप औद्योगिक वस्तुओं की मांग बढ़ेगी जिससे औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा. लेकिन भारत में कृषि क्षेत्र में श्रम की उत्पादकता कम रही है परिणामस्वरूप आज भी व्यावसायिक संरचना पूर्ववत् बनी हुई है.

तृतीय, आयोजन के प्रारम्भ से ही औद्योगीकरण की गति धीमी रही है. और 1965 से 1980 के बीच तो औद्योगिक क्षेत्र में गतिहीनता भी बनी रही. इसका मुख्य कारण था कृषि क्षेत्र की उत्पादकता कम होने से औद्योगिक वस्तुओं के बाजार का सीमित होना. साथ ही आर्थिक समृद्धि से लाभों का असमान वितरण हुआ था. कुछ चुने हुए विशिष्ट आय वर्गों को ही इससे फायदा हुआ और केवल उन्हीं उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बढ़ा जो इस समृद्धशाली वर्ग की मांग की पूर्ति के लिए आवश्यक थे. अन्य उद्योगों का विकास अत्यन्त असंतोषजनक था. | इन परिस्थितियों में एक उपयुक्त नीति यही होती कि सरकार औद्योगिक वस्तुओं के घरेलू बाजार को बढ़ाने का प्रयास करती. इसके लिए आवश्यक था एक और उत्पादकता के स्तर को बढ़ाने के निरन्तर प्रयास किये जाते और दूसरी ओर राष्ट्रीय आय का पुनर्वितरण निर्धन आय-वर्गों के पक्ष में किया जाता. इस नीति से औद्योगिक वस्तुओं और सेवाओं के बाजार का प्रसार होता जिससे द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होते .

जे. कृष्णमूर्ति (J. Krishnamurty) के अनुसार, 1971 से 1981 के बीच कार्यकारी जनसंख्या का कृषि से अन्य व्यवसायों की ओर स्थानांतरण अवश्य हुआ है. यह क्रम निरन्तर जारी रहा तो हो सकता है इस शताब्दी के अन्त तक व्यवसायिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाएं. लेकिन उन्होंने स्थानान्तरण के स्पष्ट कारणों की व्याख्या नहीं की है.

 

व्यावसायिक संरचना और शहरीकरण (Occupational Structure and Urbanisation)

About abhinav

Check Also

महाभूलेख महाराष्ट्र राज्य भूमि अभिलेख (7/12 व 8अ) ऑनलाइन देखें mahabhulekh.maharashtra.gov.in

महाभूलेख महाराष्ट्र राज्य भूमि अभिलेख (7/12 व 8अ) ऑनलाइन देखें online 7 12

Contents1 महाभूलेख के फायदे2 महाभूलेख गाव नमुना नंबर 7/12 (online 7 12) और 8अ मालमत्ता …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.