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व्यावसायिक संरचना और शहरीकरण (Occupational Structure and Urbanisation)

व्यावसायिक संरचना और शहरीकरण (Occupational Structure and Urbanisation)

व्यावसायिक संरचना और शहरीकरण (Occupational Structure and Urbanisation)

श्रम उत्पादन का प्राथमिक साधन होने के साथ-साथ उत्पादन के अन्य साधनों को भी सक्रियता प्रदान करके उन्हें उत्पादक गतिविधियों के लिए लाभदायक बनाता है. किसी भी देश के काम करने वाले लोगों की संख्या, आयु संरचना, लिंग संरचना, जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) काम की उपलब्धि तथा काम के प्रति दृष्टिकोण पर निर्भर करती है. ये कारण विभिन्न देशों में अलग-अलग तरह से काम करते हैं और समय के साथ बदलते रहते हैं.

व्यावसायिक संरचना और आर्थिक विकास .

सामान्यतया सभी व्यवसायों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक. प्राथमिक व्यवसायों के अन्तर्गत कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ना, वनों से लकड़ी काटना अथवा दूसरे उत्पादों को एकत्रित करना आदि क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है. अधिकतर पिछड़े देशों में जनसंख्या का एक बहुत बड़ा अंश इन व्यवसायों पर निर्भर करता है. कृषि एवं अन्य प्राथमिक गतिविधियाँ श्रम प्रधान (Labour Intensive) होती हैं. इसलिए उनमें नई-नई तकनीकों और मशीनों का प्रयोग करने के बाद भी उत्पादकता में खास वृद्धि नहीं होती है.

द्वितीयक व्यवसायों की श्रेणी में निम्न तीन प्रकार के उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं–(i) फैक्ट्री उद्योग, (ii) लघु तथा कुटीर उद्योग, तथा (iii) खनिज उद्योग. अधिकांश द्वितीयक उद्योग पूँजी प्रधान होते हैं. अल्पविकसित देशों में द्वितीयक उद्योगों के क्षेत्र में रोजगार की दृष्टि से लघु तथा कुटीर उद्योगों का क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण होता है. लेकिन खनन तथा फैक्ट्री उद्योगों की तुलना में इसमें आय का स्तर नीचा रहता है. अतः खनन तथा फैक्ट्री उद्योगों के विकास द्वारा श्रम शक्ति का प्रतिशत भाग बढ़कर आय का स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है.

तृतीयक व्यवसायों में व्यापार, परिवहन, संचार बैंकिंग, बीमा इत्यादि को शामिल किया जाता है. इन व्यवसायों में श्रम की उत्पादकता और आय अधिक होती है. इसलिए जब जनसंख्या का बड़ा भाग प्राथमिक उद्योगों में द्वितीय उद्योगों में और अन्ततः तृतीयक उद्योगों की ओर बढ़ता है तो यह राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का सूचक है.

व्यावसायिक संरचना में अन्तर

वर्तमान में विभिन्न देशों की व्यावसायिक संरचना में महत्वपूर्ण अन्तर है. विकसित और अल्पविकसित देशों की व्यावसायिक संरचना में इतना स्पष्ट अन्तर दिखाई देता है कि विचाराधीन मुद्दों (Issues) के बारे में कोई विवाद नहीं है, हालांकि विभिन्न देशों के लिए तुलनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. यदि आंकड़े मिल भी जाएं तो भी उनका प्रयोग किया निर्णय तक पहुंचने में कठिन होता है, क्योंकि उनका संकल्पनात्मक आधार विभिन्न देशों में अलग-अलग होता है. अल्पविकसित देशों के सन्दर्भ में आंकड़े इकट्ठा करना और भी कठिन है, क्योंकि यहां जनसंख्या का काफी बड़ा भाग एक से अधिक व्यावसायों से जुड़ा रहता है. जैसे, भारत के शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले लोग फसल की बुआई व कटाई के समय गांवों में लौट जाते हैं और काम पूरा होते ही पुनः काम की तलाश में शहरों में चले आते हैं. इन परिस्थितियों में जिस व्यवसाय से किसी व्यक्ति को अपनी कुल आय का आधा या उससे अधिक भाग प्राप्त होता है, उसे व्यक्ति का व्यवसाय मान लेना चाहिए. आंकड़ों के एकत्रीकरण में समरूपता न होने के कारण किसी भी विश्लेषणात्मक अध्ययन में इन आंकड़ों के प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए.

 

आर्थिक संवृद्धि और विकास (Economic Growth and Development)

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