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भारत में शहरीकरण

भारत में शहरीकरण

भारत में शहरीकरण

शहरीकरण प्रक्रिया विकसित और अल्पविकसित सभी प्रकार के देशों में दिखाई पड़ती है. उत्पादन में विशिष्टीकरण और विनिमय को बाजारों से प्रोत्साहन मिलता है और बाजारों का विकास शहरों के विकास के साथ जुड़ा है. आजकल जहां उद्योगों की स्थापना होती है वहीं जनसंख्या का संकेन्द्रण होने लगता है और शहर बस जाते हैं. पुराने शहरों में नए कारखानों के खुलने से आर्थिक कारोबार बढ़ता है और जनसंख्या तेजी के साथ बढ़ती है. परन्तु अल्पविकसित देशों में शहरीकरण एक गम्भीर समस्या बनता जा रहा है जिसका समाधान आवश्यक है.

भारत में शहरीकरण की प्रवृत्तियाँ

शहरीकरण की तेज प्रक्रिया:

भारत में 1961 से 1981 के बीच शहरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आयी थी. साठ और सत्तर के दशक में शहरी जनसंख्या में क्रमशः 38.3 प्रतिशत और 46.2 प्रतिशत की वृद्धि रही थी. जबकि 1981 से 1991 के बीच शहरीकरण की प्रक्रिया कुछ धीमी हुई क्योंकि इन दस वर्षों में शहरी जनसंख्या में केवल 36.2 प्रतिशत वृद्धि हुई. 1991-200. के दशक में शहरीकरण की प्रक्रिया और ज्यादा धीमी रही. इन दस वर्षों में शहरी जनसंख्या में केवल 30.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई . निरपेक्ष रूप में भारत की शहरी जनसंख्या अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है और हमें भविष्य में देश के विकास की दृष्टि से इसका महत्व समझना होगा. यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि विभिन्न जनगणनाओं में शहरी क्षेत्र की संकल्पना पूरी तरह एक-सी नहीं है इसलिए जनसंख्या के ग्रामीण और शहरी वितरण के आंकड़ों का सावधानी से प्रयोग किया जाना चाहिए. उदाहरणार्थ, 1951 की. अपेक्षा 1961 की जनगणना में शहरीकरण क्षेत्र की कठोर परिभाषा अपनाई गई थी जिसकी वजह से जहां 1951 में 2,844 शहर थे, वहां 1961 में उनकी संख्या घटकर केवल 2,330 रह गई थी. परन्तु 1961 से 1991 तक शहरी इकाई की संकल्पना में कोई अन्तर नहीं था. भारत में 1991 तक शहरी इकाई की संकल्पना में कोई अन्तर नहीं था. भारत में 1991 की जनगणना में शहरी क्षेत्र निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया था.

  1. वे सभी जगहें जहाँ पर नगरपालिका, नगर निगम, छावनी बोर्ड या नोटीफाइड टाउन एरिया है.
  2. वे सभी स्थान जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा करते हैं–

(i) कम से कम 5,000 जनसंख्या हो,

(ii) पुरुष कार्यकारी जनसंख्या का 75 प्रतिशत गैर कृषि व्यवसायों में लगा हो,

(iii) जन सघनता कम से कम 400 प्रति वर्ग किलोमीटर हो. शहरी क्षेत्र की यह परिभाषा सर्वमान्य नहीं हैं, क्योंकि अन्य देशों में भी शहरी इकाई को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया गया है.

शहरीकरण की माप के लिए मुख्य रूप से निम्न रीतियों का प्रयोग किया जाता है. इस दृष्टि से सबसे आसान रीति यह है कि देश की कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का अनुपात देखा जाए. भारत में जहां 1901 में शहरी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का केवल 10.8 प्रतिशत थी, वहीं 1951 में यह 17.3 प्रतिशत और 2001 में 27.8 प्रतिशत हो गई. 1951 से 2001 के बीच शहरों में जनसंख्या वृद्धि की दर 3.08 प्रतिशत वार्षिक रही है. इसी अवधि में ग्रामीण क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि की दर 1.84 प्रतिशत वार्षिक थी. एक अन्य रीति यह है कि हम शहरी जनसंख्या में निरपेक्ष वृद्धि पर विचार करें. 1951 की तुलना में 2001 में जहां ग्रामीण क्षेत्र की जनसंख्या 2.5 गुनी हुई, वहीं शहरी क्षेत्र की जनसंख्या 4.6 गुनी हो गई. अतः किसी भी रीति से शहरीकरण प्रक्रिया की एक-सी तस्वीर सामने आती है.

शहरों के ढांचों में काफी स्थिरता :

शहरीकरण प्रक्रिया की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहां के शहरों के ढांचों में काफी स्थिरता है. 1901 से 1991 की अवधि में शहरों की जनसंख्या आठ गुनी से भी अधिक हो गई है, लेकिन शहरों की संख्या लगभग दो गुनी हुई है. इसका अर्थ यह है कि विद्यमान शहरों में जनसंख्या अधिक तेजी से बढ़ी है, इसकी तुलना में नए शहरों का विकास ज्यादा नहीं हुआ है. कुछ विशेषज्ञों की राय में उन क्षेत्रों में जहां शहर कम हैं और बहुत बिखरे हुए हैं वहां पर जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप बड़ी संख्या में शहरों का विकास होगा तथा जिन गांवों में लघु उद्योगों की स्थापना की जा रही है उनका शहरों में रूपान्तरण होने की संभावना अधिक है.

आकार-वर्ग के आधार पर शहरों के विकास का स्वरूप :

भारतीय जनगणनाओं में जनसंख्या के आकार के आधार पर शहरों को निम्न छहः वर्गों में बांटा जाता है.

वर्ग जनसंख्या
I 1,00,000 से अधिक
II 50,000 से 99,000
III 20,000 से 49,999
IV 10,000 से 19,999
V 5,000 से 9,999
VI 5,000 से कम

 

विकसित देशों की तरह भारत में भी शहरी जनसंख्या का वर्ग I के शहरों में केन्द्रीकरण है. 1951 में वर्ग I में आने वाले शहरों की संख्या कुल शहरों की 2.7 प्रतिशत थी और इनमें कुल शहरी जनसंख्या का 44.6 प्रतिशत भाग रहता था. 1991 में इनकी संख्या 8.2 प्रतिशत और जनसंख्या 68.2 प्रतिशत हो गई. वर्ग I में आने वाले शहरों की संख्या 1971 में 9 थी जो बढ़कर 1991 में 23 हो गई तथा 2001 में इनकी संख्या बढ़कर 35 हो गई. भारत में चार महानगरों-कलकत्ता, बम्बई, दिल्ली और मद्रास में 1981-91 के दशक में जनसंख्या वृद्धि क्रमशः 18.7, 33.4, 46.2 और 25.0 प्रतिशत हुई. इस तरह इन चार महानगरों को मिलाकर जनसंख्या 268.74 लाख से बढ़कर 372.24 लाख हो गई.

शहरीकरण का क्षेत्रीय स्वरूप:

भारत में सतही तौर पर देखने से लगता है कि विभिन्न राज्यों में शहरीकरण की प्रक्रिया अलग-अलग रही है. 1981 से 1991 के दशक में जहां उत्तर-प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े राज्यों में शहरी जनसंख्या में वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर थी, वहीं पंजाब, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल में (जो अपेक्षाकृत कम पिछड़े राज्य हैं) शहरी जनसंख्या में वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत से नीचे थी. ऊँची प्रतिव्यक्ति आय वाले राज्यों में महाराष्ट्र और हरियाणा ऐसे राज्य हैं जिनमें शहरी जनसंख्या में वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत से ऊँची थी. इस सन्दर्भ में केरल को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि 1971 में केरल की 95 प्रतिशत जनसंख्या ऐसे गांवों में रहती थी जिनकी आबादी 5,000 से ऊपर थी. ये गाँव शहर की परिभाषा में इसलिए नहीं आ सके, क्योंकि ये इस शर्त को पूरा नहीं कर सके कि 75 प्रतिशत या अधिक पुरुष-कार्यकारी जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी होनी चाहिए.

भारत में औद्योगिक दृष्टि से विकसित राज्यों-महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में 34 प्रतिशत के ऊपर शहरी जनसंख्या है. आयोजित विकास के आरम्भिक चरण में इन राज्यों में औद्योगीकरण प्रक्रिया तेज थी, क्योंकि यहां पहले से ही कुछ उद्योग स्थापित हो चुके थे. अतः इन राज्यों में आरम्भ से ही शहरीकरण को प्रोत्साहन मिला. बाद में उद्योगों का विकेन्द्रीकरण हो जाने पर जिन पिछड़े राज्यों में उद्योग स्थापित किए गए उन राज्यों में शहरीकरण प्रक्रिया में तेजी आई. हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश हरित क्रान्ति के क्षेत्र में रहे हैं. यहाँ पर कृषि में बढ़ती उत्पादकता से इन क्षेत्रों में शहरीकरण प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिला है.

 

जनसंख्या और आर्थिक विकास (Population and Economic Development)

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