Home / भारतीय अर्थव्यवस्था / INDIAN ECONOMY in hindi / भारतीय अर्थव्यवस्था की संक्षिप्त ऐतिहासिक झलक (Historical Survey of Indian Economy)

भारतीय अर्थव्यवस्था की संक्षिप्त ऐतिहासिक झलक (Historical Survey of Indian Economy)

Contents

भारतीय अर्थव्यवस्था की संक्षिप्त ऐतिहासिक झलक (Historical Survey of Indian Economy)

भारतीय अर्थव्यवस्था की संक्षिप्त ऐतिहासिक झलक (Historical Survey of Indian Economy)

अन्योन्य ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपने विकसित लोहा उद्योग, वस्त्र उद्योग, वास्तुकला, शिल्पकला व हस्तकला उद्योगों आदि के कारण भारत प्राचीन काल में भी अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए विख्यात रहा है. यह संपन्नता 16वीं शताब्दी तक तो पूर्णतः कायम रही. परन्तु 17वीं सदी के प्रारम्भ से ही ईस्ट इंडिया कम्पनी (East India Company) ने भारत में व्यापार प्रारम्भ करके भारतीय अर्थव्यवस्था की गतिशीलता पर विपरीत प्रभाव डालना शुरू कर दिया. प्राचीनकालीन और मध्ययुगीन भारतीय अर्थव्यवस्था की समृद्धि का इससे और बड़ा प्रमाण क्या होगा कि विश्व के अधिकांश देशों-अरब, दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा यूरोपीय देशों के साथ भारत का व्यापार सुचारु रूप से और पक्ष में चलता रहा. आज भी भारत अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं के भण्डार के लिए सम्पूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान रखता है. भारत के आर्थिक इतिहास के पहलुओं का अध्ययन करने पर इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अंग्रेजों के भारत में आने के समय कम-से-कम उस स्तर पर तो थी ही जिस स्तर पर यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्थाएँ थीं.

भारतीय अर्थव्यवस्था और ब्रिटिश साम्राज्य

प्रारम्भ में तो ईस्ट इंडिया कम्पनी कुछ विशिष्ट भारतीय वस्तुओं जैसे-वस्त्र, चाय, मसाले इत्यादि का ही व्यापार करती थी जो भारत के हित में था. अंग्रेजों का व्यावसायिक अभियान 31 दिसंबर, 1600 को आरंभ हुआ. उस समय कम्पनी भारत के पूर्वी व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर चुकी थी. शीघ्र ही यह कम्पनी भारत के समग्र व्यावसायिक मानचित्र पर मंडराने लगी. 15वीं शतादी के उत्तरार्द्ध (1857 ई.) में जब भारत पूरी तरह ब्रिटिश शासन की एक बस्ती (Colony) मात्र वनकर रह गया, तब भारतीय अर्थव्यवस्था को सुनियोजित ढंग से शोषण प्रारम्भ हो गया. इंग्लैण्ड की जनता की अधिकांश आवश्यकतओं को पूर्ति के लिए भारतीय वस्तुओं का निर्यात किया जाने लगा और वहां भारतीय वस्तुओं की मांग में इतनी वृद्धि होने लगी कि इंग्लैण्ड की सरकार को भारत से आयातित वस्तुओं पर भारी कर लगा देना पड़ा. दूसरी ओर, इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति का भी भारतीय उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि भेदभावपूर्ण तरीके से इंग्लैण्ड के औद्योगिक उत्पादों के उपभोग के लिए भारतीय जनता पर विभिन्न तरीकों से दबाव डाले गए. वहाँ की वस्तुओं के साथ भारत के परम्परागत उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ प्रतियोगिता कर पाने में असमर्थ थीं. फलस्वरूप, यहाँ के उद्योगों का पतन स्वाभाविक था. यह ब्रिटिश शासन की एक तरफा तथा शोषण की नीति का ही नतीजा था और कुछ नहीं. इसे भी दुनिया का एक बड़ा आश्चर्य ही कहा जाएगा कि व्यापार हेतु आई एक व्यापारिक कम्पनी भारत जैसे एक विशाल देश की शासक बन बैठी. विदेशी शासन करीब 200 वर्षों तक चला और इसी बीच भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई.

यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने भारत में परिवहन तथा संचार माध्यमों का विस्तार किया और आधुनिक तरीके पर कुछ आधारभूत उद्योगों की स्थापना भी की, परन्तु वह सब कुछ उसने अपने व्यवसाय-व्यापार के संवर्धन के लिए तथा अपनी शासन व्यवस्था को सुचारुपूर्ण से चलाने के लिए ही किया था. सन् 1818 में कलकत्ता में स्थापित पहली सूत मिल, 1875 में बराकर में स्थापित कच्चे लौहे का पहला कारखाना, 1859 में सीरामपुर के निकट रिसरा नामक स्थान पर स्थापित पहली जूट मिल, 1853 में बम्बई से थाणे के बीच बिछाई गई. पहली रेलवे लाईन, 1853 में ही कलकत्ता में आगरा तक लगाई गई पहली टेलीग्राफिक लाईन आदि ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हम ब्रिटिश शासन के हितों की रक्षा के रूप में ही मानेंगे. हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों और राष्ट्रवादियों में इस विषय को लेकर मतभेद है कि इन कायों के पीछे ब्रिटिश सरकार का दृष्टिकोण भारती अर्थव्यवस्था के हित में था या कि इससे वे केवल अपने हितों की पूर्ति करते थे?

इस आशय की सम्पुष्टि के लिए लगभग 200 वर्षों की लम्बी अवधि के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अवलोकन निम्नांकित पहलुओं के अध्ययन से किया जा सकता है-

1. संसाधनों का आर्थिक उत्सारण:

ब्रिटिश काल में आर्थिक गतिहीनता में एक महत्वूपर्ण कारक था-स्वेदशी संसाधनों का भारी मात्रा में इंग्लैण्ड को अन्तरण. इंग्लैण्ड को निर्यात किए गए अपने माल के लिए भारत को ही भुगतान करना पड़ता था. इसका अर्थ यह हुआ कि अंग्रेजों ने भारत को बिना कुछ दिए ही इसका सब कुछ लूट लिया. अंग्रेजों के पूर्व भी लम्बे समय से विदेशी शासकों द्वारा भारतीयों का शोषण किया गया था, किन्तु उन्होंने अपना धन खर्च किया जिससे भारतीय व्यापार को कई क्षेत्रों में बढ़ावा मिला. मगर ‘होम चार्जेज’ (Home Charges) के रूप में संसाधनों के निष्कासन अथवा उत्सारण की निरंतर प्रक्रिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया. विदेशी ऋणों पर व्याज, विदेशी निवेश पर लाभ और रॉयल्टी, कर्मचारियों के वेतन व पेंशन आदि के भुगतान के रूप में काफी बड़ी रकम देश से बाहर चली गई. एक अनुमान है कि 1757 और 1999 के बीच कम-से-कम राष्ट्रीय आय का दो-तीन प्रतिशत भाग प्रति वर्ष इस तरह बाहर चला जाता था. एक आकलन के अनुसार, 1899 से 1865 तक गृह खचों के रूप में ब्रिटिश शासन ने इंग्लैण्ड को करीब 10 करोड़ पौंड दिये. इससे ब्रिटिश अर्थव्यवस्था निस्संदेह मजबूत हुई.

2. दस्तकारों तथा नील उत्पादकों का विनाश व शोषण :

भारत में दस्तकारियाँ काफी उन्नत्र थीं. बुनकरों और दूसरे कारीगरों का दमन और लूट-खसोट बहुत कष्टदायक थीं. परतंत्रता से जकड़े कारीगर अब यह निर्णय तक नहीं कर पाते थे कि क्या, कहाँ और कब उत्पादन करें? वे अंग्रेजों को तथा उनके दलालों के लिए ही काम करने को विवश थे. इससे भारत के ग्रामोद्योग नष्ट हो गए. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने निर्यात के लिए नील की खेती को 1790 से प्रोत्साहित करना प्रारंभ किया. 19वीं सदी के प्रारम्भ में करीब 1,000 यूरोपीय नील उत्पादकों के रूप में बंगाल में आकर बस गए और भारतीय नील कृषकों को इस प्रकार शोषण हुआ कि उनका सर्वानाश ही हो गया.

3. अनुचित राजस्व का निर्धारण:

अंग्रेजों ने अक्टूबर 1764 में बंगाल के पदच्युत नवाब, अवध के नवाव तथा कुछ बचे हुए मुगल सम्राटों की संयुक्त सेना पर विजय प्राप्त करने सम्राट से ‘बंगाल की दीवानी’ अर्थात् राजस्व प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त कर लिया. वसूली के लिए जमींदारों की नियुक्ति की गई जो अन्यायपूर्ण एवं निर्दयता पूर्ण तरीकों से किसानों से लगान वसूलते थे. यह राजस्व असैनिक और सैनिक व्ययों को पूरा करने के लिए, बंगाल के नवाब को भत्ता देने तथा सम्राट को नजर देने के बाद भी उनके पास काफी बड़ी अधिशेष राशि वच जाती थीं. 1765-1770 की छह वर्ष की अवधि में कुल बेशी (Surpius) 40 लाख पौंड थी. शोषण में वृद्धि की चरम सीमा थी यह नीति .

4. कृषि की दयनीय स्थिति :

कृषि की दुर्दशा ब्रिटिश शासन के दौरान काफी हद तक हुई. कई बार होने वाले अकाल से भारत की जनंसख्या का बड़ा भाग भुखमरी का शिकार हो रहा था. एक आंकड़े के अनुसार 1854 से 1901 तक लगभग 3 करोड़ व्यक्ति अकाल के कारण मौत के ग्रास बन गए. दूसरी ओर भारतीय कृषि के विकासार्थ ब्रिटिश शासन के पास कोई सही योजना न थी. अंग्रेजों ने कृषि का व्यवसायीकरण (Commercialisation) कर दिया और परिणामस्वरूप कृषि में नकदी फसलों (Cash Crops) को ही प्राथमिकता दी गई. भू-राजस्व के बोझ तले दबा कृषक समुदाय अंग्रेजों के इस शोषण का शिकार हो गया.

5. उद्योगों की उपेक्षा :

देश में सस्ती मजदूरी दर और कच्चेमाल की पर्याप्त उपलब्धता ने विदेशी उद्योगपतियों को आकर्षित किया, किन्तु उन्होंने वैसे ही क्षेत्रों में उत्पादन को चुना जिनसे उन्हें अधिक लाभ मिल रहा था या फिर जिनसे ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था मजबूत होती थी. वैसे जमशेदजी टाटा आदि कुछ विशिष्ट उद्योगपतियों ने भारत में कुछ भारी उद्योगों की स्थापना की, लेकिन यही पर्याप्त नहीं था.

6. असमान विदेशी व्यापार :

शताब्दियों तक अपने विशिष्ट उत्पादों के लिए विख्यात भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप में ब्रिटिश शासन के दौरान गुणात्मक परिवर्तन हुआ. कुछ ही दशकों के भारत खाद्यान्न तथा कच्चे माल जैसे प्राथमिक उत्पादों का निर्यात करने लगा जिससे ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को बल मिला. दूसरी ओर भारत, ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं के लिए एक अच्छा बाजार बन गया. इस प्रकार भारत के विदेशी व्यापार का स्वरूप बिल्कुल प्रतिकूल और असमान हो गया.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की भारतीय अर्थव्यवस्था

संसार में प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से भारत का स्थान काफी नीचे है. और इसीलिए आज भी यह एक अल्प-विकसित देश है. यह स्थिति तो स्वतंत्रता प्राप्ति के 56 वर्षों बाद की है. आजादी के समय इस देश का आर्थिक ढाँचा आज की तुलना में बहुत कमजोर था और प्रति व्यक्ति आय और भी कम थी. बुनियादी उद्योगों का बिल्कुल विकास नहीं हुआ था. भारी इंजीनियरिंग, मशीनी औजार तथा रासायनिक उद्योग तो विकसित थे ही नहीं, लगभग 72 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर थे. कृषि पर जनसंख्या के भारी दबाव के कारण प्रच्छन्न बेरोजगारी थी . द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector) में, जिसमें विनिर्माण उद्योग होते हैं, केवल 10.62 प्रतिशत और तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) अर्थात सेवा क्षेत्र (Service Sector) में 17.26 प्रतिशत लोगों के पास रोजगार था.

आजादी के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को एक करारा झटका तब लगा जब देश को विभाजन की विभीषिका से गुजरना पड़ा. इसने भारत के भौगोलिक मानचित्र के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का सम्पूर्ण संतुलन ही बिगाड़ कर रख दिया. भारत का 23% भू-भाग जिसमें अधिकांश सिंचित भूमि का हिस्सा था वह पाकिस्तान को चला गया और जनसंख्या का केवल 18% ही उसके हिस्से में गया. विभाजन ने औद्योगिक क्षेत्र में भी काफी असंतुलन पैदा कर दिया.

तीव्र आर्थिक विकास

स्वतंत्रता के समय की अर्थव्यवस्था एक गतिहीन अर्थव्यवस्था थी. बाजार तंत्र (Market Mechanism) पर पूरी तरह निर्भर रहकर न तो देश की समस्याओं का समाधान किया जा सकता था और न ही लम्बे अर्से से रुकी हुई विकास प्रक्रिया को फिर से शुरू कर पाना संभव था. समाजवादी देशों के नियोजित आर्थिक विकास की पद्धति को ध्यान में रखते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, जिन्हें भारत में ‘आयोजन का कर्णधार’ भी कहते हैं, की अध्यक्षता में 1950 में योजना आयोग की स्थापना की गई. पके पर्व भी भारत में आयोजन के महत्व को स्वीकारते हुए पं. नेहरू की अध्यक्षता में ही 1938 में राष्ट्रीय आयोजन समिति नियुक्त की गई थी. 1951 ३ आर्थिक आयेाजन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई. भारत में आर्थिक आयोजन के मख्यतः निम्नांकित उद्देश्य हैं : (i) आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth), (ii) आत्मनिर्भरता (Self-Sufficiency), (iii) पूर्ण रोजगार (Full Employment), (iv) न्यूनतम आर्थिक असमानताएँ (Minimum Economic Disparities), (v) गरीबी निवारण (Poverty Eradication) और (Vi) आधुनिकीकरण (Modernisation).

अपने उपर्युक्त वर्णित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में आयोजन के इन 56 वर्षों में भारत ने कोई आशाजनक प्रगति हासिल नहीं की है. परन्तु फिर भी, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं और विकास भी हुए हैं. भारत ने आज खाद्यान्न के क्षेत्र में पूर्ण आत्म-निर्भरता पा ली है. लोगों के जीवन-स्तर में सुधार हुआ है. सम्पूर्ण योजना-काल में औसत वार्षिक विकास दर लगभग 4 प्रतिशत आती है जबकि 1901-1946 की अवधि में केवल 1.2 प्रतिशत ही थी. सम्पूर्ण योजना काल में प्रति व्यक्ति आय में वार्षिक वृद्धि दर 1.7 तथा प्रति व्यक्ति उपभोग में वार्षिक वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत है. हाल के वर्षों में वर्तमान केंद्र सरकार ने जिन आर्थिक नीतियों को क्रियान्वयित किया है उनको देखने से लगता है कि भारत शीघ्र ही विकास पथ पर द्रुत गति से आगे बढ़ पाने में सक्षम हो पाएगा.

भारतीय अर्थव्यवस्था के अल्पविकसित स्वरूप के प्रमुख लक्षण

इसमें कोई सन्देह नहीं कि आजादी के बाद भी भारत में कोई क्रान्तिकारी आर्थिक विकास नहीं हो पाया है और भारतीय जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग दीनता की अवस्था में जीवन-यापन कर रहा है. इतना ही नहीं, भारत में अप्रयुक्त प्राकृतिक संसाधन विद्यमान हैं. निम्नांकित लक्षण यह सिद्ध करते हैं. कि भारत एक अल्पविकसित देश है :

1. प्रतिव्यक्ति निम्न आय तथा गरीबी :

प्रायः सभी अल्पविकसित देशों की राष्ट्रीय आय प्रतिव्यक्ति बहुत ही कम है. भारत की प्रतिव्यक्ति आय 2000 में 460 अमरीकी डॉलर थी जबकि अमरीका का प्रतिव्यक्ति आय 34,260 डॉलर, जापान की 34,210 डॉलर तथा जर्मनी की 25,000 डॉलर है. 1998 में जनसंख्या का 43 प्रतिशत भाग गरीबी की रेखा के नीचे था. राष्ट्रीय आय की तुलना में जनसंख्या की अधिकता के कारण व्यापक निर्धनता है. लोग भूखमरी, अल्पपोषण, कुपोषण तथा अकाल के शिकार हैं.

2. आय तथा संपत्ति के वितरण में असमानताएँ :

संपत्ति और पूँजी के केंद्रीकरण से ये असमानताएँ उत्पन्न होती हैं. ग्रामीण क्षेत्र में उच्च-आय वर्ग के पास सिर्फ 3 प्रतिशत जोतों के अन्तर्गत 26 प्रतिशत भू-क्षेत्र विद्यमान है; जबकि निम्न-आय वर्ग के पास उपलब्ध 55 प्रतिशत जोतों के अंतर्गत मात्र 10 प्रतिशत भूमि है. विश्व विकास रिपोर्ट (World Development Report) 1994 के अनुसार भारत की राष्ट्रीय आय का 41.4 प्रतिशत 20 प्रतिशत लोगों के पास केन्द्रित है, जबकि गरीब वर्ग के 20 प्रतिशत लोगों को केवल 8.0 प्रतिशत भाग ही प्राप्त है. 1993-94 में बिरला, टाटा तथा जे.के. ग्रुप के पास सामूहिक रूप से 20 बड़े व्यावसायिक घरानों की कुल परिसम्पत्तियों का 50 प्रतिशत भाग उपलब्ध था, जबकि यहाँ की आबादी का लगभग 25 प्रतिशत माग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है.

3. कृषि की प्रधानता :

भारत का व्यावसायिक ढाँचा इसके आर्थिक पिछड़ेपन का प्रमाण है. 1951 में 24.9 करोड़ व्यक्ति अर्थात् कुल जनसंख्या का 70 प्रतिशत कृषि पर आजीविका हेतु निर्भर था और दुःखद स्थिति यह है कि आज भी 2001 में यह प्रतिशत 65 के आसपास है. 1961-62 में राष्ट्रीय आय का 54.0 प्रतिशत भाग कृषि से अजित हुआ था जबकि 1991 में कुल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटकर 31 प्रतिशत था. भारत में इस समय भी कुल कार्यशील श्रम-शक्ति का 65 प्रतिशत भाग कृषि-क्षेत्र में लगा हुआ है, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में यह प्रतिशत मात्र 2 है.

4. जनांककीय विशेषताएँ :

भारतीय अर्थव्यवस्था जन-विस्फोट को गम्भीर समस्या से ग्रस्त है. 1961 की जनगणना के अनुसार, जनसंख्या 43.9 करोड़ थी जो 1991 की जनगणना में बढ़कर 84.65 करोड़ हो चुकी थी. जनगणना 2001 के अनुसार यह लगभग 1 अरब 2 करोड़ हो चुकी है. भारत की जनसंख्या का एक भयंकर लक्षण यह है कि जहां सामान्य अन्तरात में जन्म-दर लगभग स्थिर है वहीं मृत्युदर में पिछले 50 वर्षों में बड़ी तेजी से कमी आई है. 2001 में जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 1.95% प्रतिशत रही है. जनसंख्या की ये विशेषताएँ भारत के समस्त विकास कार्यक्रमों को मटियामेट कर देती है.

5. बेरोजगारी तथा अल्प-रोजगारी :

श्रम-शक्ति के अतिरेक से भारत में समस्त कार्यकारी जनसंख्या को लाभकारी रोजगार नहीं मिल पाता है क्योंकि भारत में पूँजी की कमी के कारण बेरोजगारी का स्वरूप ही संरचनात्मक (structural) है. यहाँ बेरोजगारी कई रूपों में व्याप्त हैपूर्णकालिक, मौसमी, प्रच्छन्न आदि. जबकि विकसित देशों में केवल चक्रीय बेरोजगारी पाई जाती है, जो अल्पकालिक होती है. 1951 में भारत में बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या 33 लाख थी, जबकि आज यह संख्या करीब 3 करोड़ है. बेरोजगारी में लगातार वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त चिंतनीय विषय है.

6. पूँजी की कमी :

भारत में पूंजी का अभाव दो रूपों में प्रकट होता है-प्रथम प्रति व्यक्ति उपलब्ध पूँजी की निम्न मात्रा और द्वितीय पूँजी-निर्माण की निम्न दर. 1950-51 में कुल शुद्ध आय का लगभग 7 प्रतिशत बचाया गया और यह बचत 1991-92 में बढ़कर 15.6 प्रतिशत हो गई. किन्तु, वह कतिपय शुभ संकेत नहीं है क्योंकि भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 1.93 जनसंख्या के कारण सिर्फ उत्पन्न अतिरिक्त भार के सहन के लिए वर्तमान मुद्रास्फीति को नजर में रखते हुए 16-17 प्रतिशत पूँजी-निर्माण की आवश्यकता है, जबकि इससे विकास के कार्यक्रमों को कोई वित्तीयन संभव नहीं. अतएव इस संदर्भ में भारत में पूंजी-निर्माण की दर पर्याप्त नहीं है.

7. घटिया मानव-पूँजी :

इस स्पष्ट लक्षण के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में व्याप्त भयंकर अशिक्षा, असभ्यता, अंधविश्वास, सामाजिक प्रतिबंध, भाग्यवाद, रूढ़िवाद आदि पूर्णतः जिम्मेदार हैं. मानवीय संसाधनों का देश के आर्थिक विकास के साथ बड़ा ही गहरा संबंध है. यही कारण है कि शिक्षा, कौशल निर्माण, अनुसन्धान और स्वास्थ्य सुधार पर किये गए व्यय को राष्ट्रीय पूंजी में समाविष्ट किया जाता है. भारत में इस संसाधन के विकास पर कुल राष्ट्रीय उत्पाद का 4 प्रतिशत खर्च किया जाता है, जबकि अमेरिका में यह प्रतिशत 10

8. तकनीकी पिछड़ापन :

यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में कुछ क्षेत्रों में तकनीकी विकास हुआ है, लेकिन अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह काफी कम है. शक्ति या ऊर्जा के उपभोग को ही तकनीकी विकास का एक उचित मानदंड माना जाता है. 2001 के लिए विश्व बैंक रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में प्रतिव्यक्ति ऊर्जा का उपभोग, जिसे हजार किलोग्राम तेल के रूप में मापा गया है 479 था, जबकि अमेरिका में 7,822 कनाडा में 10,000 और ब्रिटेन में यह 3,646 था. इसी प्रकार, भारत में शोध और विकास पर प्रति-व्यक्ति व्यय केवल $2.6 है जबकि अमेरिका में यह $375.60 है.

9. उपभोग के समाजार्थिक सूचक :

भारत में प्रति व्यक्ति दैनिक कैलोरी उपभोग 2,126 है वहीं अमेरिका, पश्चिमी जर्मनी और इंग्लैण्ड में क्रमशः 3,649, 3,519 तथा 3,148 है. प्रति हजार जनसंख्या के लिए मोटर-गाड़ियों, टी.वी., टेलीफोन, डॉक्टर की उपलब्धता दर भारत में क्रमशः 533, 154, 250 और 3,700 हैं, जबकि यह उपलब्धता दर अमेरिका में काफी अधिक है. यहाँ प्रत्येक 2 व्यक्ति पर 1 मोटर गाड़ी; प्रत्येक 1.2 व्यक्ति पर 1 टेलीविजन; प्रति 1.3 व्यक्ति के लिए 1 टेलीफोन तथा प्रति 500 व्यक्ति पर 1 डॉक्टर है. इन आँकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जन-जीवन के रहन-सहन और उपभोग का स्तर काफी पिछड़ा हुआ है.

10. निर्बल आर्थिक संगठन :

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बचत की दर . को ऊँचा करने के लिए भारत में अब तक पर्याप्त मात्रा में वित्तीय संस्थाएँ कायम नहीं हो पाई हैं. छोटे-छोटे कृषकों के लिए आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराना, उद्योगों को मध्यकालीन ऋण मुहैया कराना आदि आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, जो बिना पर्याप्त और मजबूत आर्थिक संगठन के असंभव है. भारत में इसकी नितांत कमी है.

सारांश यह कि उपयुक्त मूल लक्षणों के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप अल्पविकसित है, भले ही हाल के वर्षों से भारत अपने आप को विकासशील मान रहा है. इन सब संस्थानात्मक अड़चनों के समाधान हेतु कुशल और ईमानदार प्रशासन की आवश्यकता है, जिसकी इस देश में भारी कमी है.

भारतीय अर्थव्यवस्था का विकासशील स्वरूप

यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था के अल्पविकसित स्वरूप को नकारा नहीं जा . सकता, किन्तु अर्थव्यवस्था के विकासशील स्वरूप के भी कुछ लक्षण भारत में विद्यमान हैं. ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन थी, जो आजादी के बाद समाप्त हो गई. स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत ही आयोजन की प्रक्रिया के लागू हो जाने से भारत के आर्थिक विकास की प्रक्रिया को काफी प्रोत्साहन मिला जिसके कई अच्छे नतीजे भी सामने आए है. 1950-51 से 1998-99 की अवधि में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में 5.5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि रही है. प्रति व्यक्ति आय में भी इस अवधि में 153 प्रतिशत की भी आशातीत वृद्धि हुई है. जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण में स्थिरता के विपरीत भारत में भूमि संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं. लोहा और इस्पात, भारी रसायन, उर्वरक, भारी इंजीनियरिंग, मशीनी औजार, रेल इंजन, बिजली के भारी उपकरण, एल्युमीनियम, पेट्रोलियम पदार्थ आदि कई विशिष्ट आधारभूत और भारी उद्योगों की स्थापना भी आजादी के बाद खूब जमकर हो रही है. अतएव, इस आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था के विकासशील स्वरूप को स्वीकार लेना उचित ही ठहरता है.

 

आर्थिक संवृद्धि और विकास (Economic Growth and Development)

About abhinav

Check Also

ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव (Economic Consequences of British Rule)

ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव (Economic Consequences of British Rule)

Contents1 उपनिवेशी अर्थव्यवस्था : 2 अर्द्ध सामंती अर्थव्यवस्था : 3 पिछड़ी अर्थव्यवस्था: 4 गतिहीन अर्थव्यवस्था …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.