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भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (Nature of the Indian Economy)

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भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (Nature of the Indian Economy)

भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (Nature of the Indian Economy)

भारत-एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था को एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मानने के लिए निम्न कारक उत्तरदायी हैं.

1. प्रतिव्यक्ति आय का नीचा स्तर :

भारत की प्रतिव्यक्ति आय का स्तर कितना असंतोषजनक था इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1952-54 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 55 देशों के आंकड़े प्रकाशित किये, जसमें भारत का स्थान अल्पविकसित राष्ट्रों में भी बहुत नीचा था. इस समय भारत की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय की 1600 से भी कम है. वल्र्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार 2000 में भारत की प्रतिव्यक्ति आय 460 डॉलर थी.

2. आय और सम्पत्ति का अन्यायपूर्ण वितरण :

भारत में आय और सम्पत्ति का वितरण असमान और अन्यायपूर्ण है. जब उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व (Ownership) होता है तो थोड़े से लोगों के पास सम्पत्ति का केन्द्रीकरण होता है. सम्पत्ति और पूँजी के केन्द्रीकरण से आय की असमानताएं उत्पन्न होती हैं.

3. कृषि की प्रधानता :

भारत की जनसंख्या का व्यावसायिक आधार पर विभाजन संतोषप्रद नहीं है. 1951 में 70 प्रतिशत जनसंख्या तथा 2001 में 61 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर थे, जबकि सं.रा. अमेरिका में 2 प्रतिशत व्यक्ति इस व्यवसाय में लगे हैं.

4. जनसंख्या में तेज वृद्धि और उच्च निर्भरता अनुपात :

अन्य अल्पविकसित राष्ट्रों की भांति भारत की जनसंख्या भी निरन्तर बढ़ रही है. 1961 में जनसंख्या 43.9 करोड़ थी, जो 2001 में बढ़कर 1 अरब 2 करोड़ हो . गयी. ऊंची जनसंख्या वृद्धि के कारण यहाँ का निर्भरता अनुपात (dependency Ratio) भी ऊंचा है.

5. पूँजी की कमी :

किसी देश में पूँजी का संचय ही उस देश की अर्थव्यवस्था को उसके पिछड़ेपन से मुक्ति दिला सकता है. भारत में 1950-51 में कुल शुद्ध आय का लगभग 7 प्रतिशत भाग बचाया गया तथा शुद्ध निवेश (Net investment) का स्तर भी यही था. बचत का इतना न्यून होने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सभी कारण उत्तरदायी थे. इसमें बाद में थोड़ा सुधार हुआ और 1997-98 में यह बढ़कर 23.1 प्रतिशत हो गया.

6. बेरोजगारी :

भारत में बेरोजगारी की स्थिति गम्भर है जो लगातार बढ़ती जा रही है. 1951 में 33 लाख तथा 1966 में बढ़कर यह 2 करोड़ 20 लाख हो गई. 1997 में बेरोजगारों की संख्या 70 मिलियन लगभग है. पश्चिम के पूँजीवादी देशों में बेरोजगारी का स्वरूप चक्रीय है.

7. तकनीक का पिछड़ापन :

विकास प्रक्रिया में तकनीकी प्रगति का बुनियादी योगदान होता है, लेकिन भारत में आज भी उत्पादन कार्य के विभिन्न क्षेत्रों में तकनीक पिछड़ी हुई है. इसका मुख्य कारण पूंजीगत साधनों का अभाव तथा गरीवी है. धीरे-धीरे इस दिशा में तकनीकी विकास हो रहा है.

भारत-एक विकासशील अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था का एक और स्वरूप है, जिसे हम विकासशील अर्थव्यवस्था कहते हैं. इसमें आयोजन के दौरान कुछ ढाँचागत (Structural) परिवर्तन हुए हैं और कुछ मात्रात्मक (Quantitative) परिवर्तन. इसका विवरण निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत दिया गया है.

राष्ट्रीय आय सम्बन्धी प्रवृत्तियाँ

1. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धिः

1950-51 से 1998-99 की अवधि में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन में नियमित रूप से वृद्धि हुई है. इस सम्पूर्ण अवधि में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन में नियमित रूप से वृद्धि हुई है. इस सम्पूर्ण अवधि में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन की वृद्धि-दर 5.5 प्रतिशत वार्षिक रही है जो इस अवधि की जनसंख्या वृद्धि-दर से ऊँची थी. जिसके फलस्वरूप न केवल पूँजी संचय को प्रोत्साहन मिला है, बल्कि प्रतिव्यक्ति आय में भी वृद्धि हुई है.

2. प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि :

प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि आर्थिक संवृद्धि का परिचायक है. 1950-51 से 1998-99 तक 50 वर्षों की अवधि में इसमें 153 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 1992-93 में प्रतिव्यक्ति राष्ट्रीय आय में 2.2 प्रतिशत वृद्धि हुई. अतः पिछले दस वर्षों में इस वृद्धि को सराहनीय माना जा सकता है.

ढाँचागत परिवर्तन :

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में मात्रात्मक दृष्टि से संवृद्धि के अलावा कुछ महत्वपूर्ण ढांचागत परिवर्तन हुए हैं, जिनको देखते हुए हम आज भारत को विकासशील अर्थव्यवस्था कह सकते हैं.

1. कुल राष्ट्रीय उत्पाद के उद्योगबार वितरण में परिवर्तन :

कृषि व्यवसाय का कुल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान निरन्तर कम होता जाता है तो कहा जाता है कि आर्थिक विकास का क्रम चल रहा है. 1950-51 में कृषि और सहायक क्रियाओं का कुल राष्ट्रीय उत्पादन में भाग लगभग 56 प्रतिशत था, जो 1992-93 में घटकर 38.8 प्रतिशत रह गया. वर्तमान में यह हिस्सा केवल 25 प्रतिशत है.

द्वितीयक क्षेत्र में उद्योग, निर्माण कार्य, बिजली आदि का उत्पादन आता है. 1950-51 में इस क्षेत्र का कुल राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान लगभग 15 प्रतिशत था जो 1997-98 में बढ़कर 42.8 प्रतिशत हो गया. उपर्युक्त आंकड़ों से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में थोड़ा ढांचागत परिवर्तन हुआ है.

2. जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण में लगभग स्थिरता :

प्रत्येक विकासशील अर्थव्यवस्था में जनसंख्या का व्यावसायिक वितरण धीरे-धीरे द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों के पक्ष में बदलता है. ऐसा कृषि के महत्व में कमी और औद्योगिक विकास के कारण होता है. भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया धीमी रही है साथ ही तृतीयक क्षेत्र का विकास भी धीरे-धीरे ही हुआ है. जिस कारण जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ सकना सम्भव नहीं

है.

3. भूमि सम्बन्धों में परिवर्तन :

जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण में स्थिरता के विपरीत भारत में भूमि सम्बन्धों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं. ब्रिटिशकाल में अधिकांश कृषि भूमि पर जमींदारों का अधिकार था जो काश्तकारों से भारी लगान वसूल करते थे. आजादी के बाद जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया गया, लेकिन कृषि भूमि का काश्तकारों और खेतिहर मजदूरों में ठीक तरह से वितरण नहीं हुआ. इसके बावजूद नए भूमि सम्बन्धों के कारण उत्पादन शक्तियों का कृषि में विस्तार हुआ है. बड़े किसान आज अधिकतर कृषि कार्यों में नई तकनकों का प्रयोग करते हैं साथ ही दूसरे कृषि कार्यों के लिए खेतिहर मजदूरों को काम पर लगाया जाता है.

4. आधारभूत उद्योगों का विकास :

आजादी के समय भारत का औद्योगिक ढाँचा सामान्य रूप से अल्पविकसित तथा पिछड़ा हुआ था. द्वितीय पंचवर्षीय योजना में पूँजीगत वस्तुएं उत्पादित करने वाले उद्योगों पर जोर दिया गया था. उसके बाद अनेक आधारभूत उद्योग स्थापित किए गए हैं और औद्योगिक ढांचे में मजबूती आई है.

5. सामाजिक उपरिव्यय पूँजी का विस्तार :

उपरिव्यय पूँजी के अंतर्गत सामान्य रूप से परिवहन के साधन, सिंचाई सुविधाएँ, ऊर्जा का उत्पादन करने वाली इकाइयां, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाएँ आती हैं. आयोजन के द्वारा पिछले 43 वर्षों में भारत में सामाजिक उपरिव्यय पूँजी का काफी विस्तार हुआ है.

6. बैंकिंग और अन्य वित्तीय संस्थाओं का विकास :

आजादी के बाद देश के बैंकिंग और वित्तीय ढांचे में अनेक प्रगतिशील परिवर्तन हुए. सर्वप्रथम 1949 में रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ तथा 1955 में इम्पीरियल बैंक (वर्तमान भारतीय स्टेट बैंक) का तथा 1969 में चौदह अन्य बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. इसके अतिरिक्त समाज के प्रत्येक वर्ग की साख सम्बन्धी जरूरतों के लिए अनेक बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं का विकास किया गया है.

उपर्युक्त सभी कारकों ने आयोजन काल में एक ऐसी गति पैदा की है. जिसे देखकर आशा की जा सकती है कि आगे आने वाले वर्षों में भी तेजी के साथ विकास प्रक्रिया जारी होगी.

भारत-एक मिश्रित अर्थव्यवस्था

आजादी के बाद एक बड़े सार्वजनिक क्षेत्र का विकास हुआ है. आयोजन के द्वारा आर्थिक विकास की प्रक्रिया अपनायी गयी है. सार्वजनिक क्षेत्र की मोजदगी तथा आर्थिक आयोजन की व्यवस्था के कारण ही यहां की अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है. इसके लक्षण निम्न हैं.

1. लाभ-प्रेरित वस्तु उत्पादन :

भारत में आज उत्पादन मुख्य रूप से बिक्री के लिए किया जाता है. औद्योगिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले सभी कारखाने तथा बड़े किसान भी अपने उत्पादन का बड़ा भाग बाजार में बेचते हैं.

2. उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व:

भारत में बुनियादी उद्योगों (Basic Industries) को छोड़कर सभी उद्योग निजी क्षेत्र में हैं. इसी कारण सार्वजनिक क्षेत्र का कुल राष्ट्रीय उत्पादन में भाग 20 प्रतिशत से भी कम है.

3. सार्वजनिक क्षेत्र:

भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र का स्थान काफी महत्वपूर्ण है. विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत समस्त निवेश का लगभग 45 प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र में और शेष निजी क्षेत्र में रहा है.

4. आर्थिक आयोजन :

आर्थिक आयोजन भारतीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता है. सर्वप्रथम भूतपूर्व सोवियत संघ जो समाजवादी राष्ट्र था, ने आर्थिक आयोजन को अपनाया था. तब से दुनिया के अधिकतर देशों ने आयोजन को अपनाया तथा अब दुनिया के अधिकतर देशों में अर्थव्यवस्था का संचालन निश्चित योजनाओं के अनुसार होता है.

5. बाजार-तंत्र द्वारा आर्थिक क्रियाओं का निर्देशन:

भारतीय अर्थव्यवस्था में बाजार-तंत्र बहुत प्रभावशाली है. वस्तुओं के साथ-साथ यहां श्रम और पूंजी के पर्याप्त संगठित बाजार हैं. वस्तु बाजारों में अधिकांश चीजों की कीमतें, मांग (Demand) और पूर्ति (Supply) की शक्तियों के बीच संतुलन द्वारा निर्धारित होती हैं. भारत में मुद्रा बाजार में विविध प्रकार की वित्तीय संस्थाएं हैं. परन्तु बाजार तंत्र पर सरकार का कई तरह का नियंत्रण है.

6. एकाधिकारी प्रवृत्तियां :

भारतीय अर्थव्यवस्था में आयोजन काल में तेजी के साथ एकाधिकारी प्रवृत्तियां विकसित हुई हैं और आर्थिक-शक्ति का केन्द्रीकरण बढ़ा है. इस समय सभी बड़ी कम्पनियां या तो भारत के बड़े उद्योग गृहों से सम्बद्धित हैं या फिर में बहुराष्ट्रीय निगमों (Multinational Corporations) सम्बद्धित हैं.

7. कृषि क्षेत्र में पूर्व-पूँजीवादी उत्पादन संबंध:

भारतीय अर्थव्यवस्था में जहां औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन के सम्बन्ध विशुद्ध (Pure) रूप में पूँजीवादी हैं, वहां कृषि क्षेत्र में उत्पादन के संबंधों के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि आयोजन काल में किये गये भूमि सुधारों के बावजूद आज भी कृषि क्षेत्र में उत्पादन संबंध अधिकांश क्षेत्रों में पूर्व-पूँजीवादी (Pre-Capitalist) ही हैं. | भारतीय अर्थ-प्रणाली के स्वरूप का निर्धारण करने के लिए इसके अलग-अलग लक्षणों का वर्णन किया जा चुका है. हम इन सभी लक्षणों को मिलाकर भारत की अर्थप्रणाली का स्वरूप निश्चित करेंगे. भारत में आर्थिक आयोजन का स्वरूप समाजवादी न होकर आर्थिक आयोजन को पूँजीवादी ढाँचे के भीतर ही अपनाया गया है.

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