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ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव (Economic Consequences of British Rule)

ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव (Economic Consequences of British Rule)

ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव (Economic Consequences of British Rule)

भारतीय अर्थव्यवस्था में ब्रिटिश शासन काल के समय दूरव्यापी (Farreaching) परिवर्तन हुए जिसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था में एक उपनिवेशी, अर्द्ध-सामती, विषभागी, गतिहीन तथा पिछड़ी अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया द्वितीय विश्वयुद्ध के समय वास्तविक पूँजी के हास तथा देश के विभाजन ने इसे और अधिक हानि पहुंचाई वास्तविक रूप में भारत ने अपने उपनिवेशी अतीत से गंभीर आर्थिक समस्याएं विरासत में पाईं .

उपनिवेशी अर्थव्यवस्था :

सबसे पहले उपनिवेशी संबंध ने स्वयं को व्यापार के असमान स्वरूप में प्रकट किया देश कच्चमाल का विशाल स्रोत बन चुका था कुछ औद्योगिक उत्पादों मुख्य रूप से जूट का कपड़ा, आदि की हालत में कृषि उपज के सरल परिष्करण (Processing) तक सीमित था इसी प्रकार कुछ प्राथमिक उत्पादन जैसे खाद्यान्न, कच्चा कपास और कच्चा जूट जो आयात किये जाते थे : (i) 1 अप्रैल 1937 से चावल बेशी वाले वर्मा तथा 15 अगस्त 1947 से गेहूं और कपास बेशी वाले पश्चिमी पंजाब, सिंध तथा चावल वाले क्षेत्र पूर्वी बंगाल से पृथक हो जाने तथा (ii) हाल के दशकों में जनसंख्या वृद्धि के सापेक्षण भारतीय कृषि की धीमी वृद्धि के प्रभावी परिणाम थे उपनिवेशी अर्थव्यवस्था की एक और अभिव्यक्ति (Manifestation) इस बात में थी कि विदेशी पूँजी ने, (जिसमें अधिकांश ब्रिटिश पूँजी थी) अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली थी द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विदेशी पूंजी की जकड़ कमजोर पड़ जाने के बावजूद स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था अपने आपको इसके चंगुल से पूर्णतः मुक्त नहीं कर सकी थी .

अर्द्ध सामंती अर्थव्यवस्था :

स्थायी रूप से जमींदारी (Zamindari) बंदोबस्त के अधीन लाये गये क्षेत्रों में भूमि के स्वामित्व के अधिकार पुराने राजस्व कृषकों को ही देकर अंग्रेजों ने पुनः सामंतवाद (Fetudalism) को बल दिया वास्तविक किसान के पास कुछ भी कानूनी अधिकार नहीं रहा, जिसे मान्यता मिल सके इस प्रकार इस प्रक्रिया ने जागीदारी प्रक्रिया को जन्म दिया बिचौलियों (Intermediaries) की बढ़ती तादात, जिनमें से प्रत्येक किसान द्वारा उत्पादित उपज में भागीदार था, इससे सामंतवाद को और बल मिला .

परन्तु यह पूर्णतया एक सांमती अर्थव्यवस्था नहीं थी उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के लगभग एक बाजार अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही प्रवृत्तियों ने भारतीय पूँजी मूलक क्षेत्र को जन्म दिया स्वतंत्रता के समय तक इस क्षेत्र ने अपनी जड़ें काफी मजबूत कर ली थी  .

पूँजीवाद (Capitalism) वास्तव में कृषि क्षेत्र में प्रवेश कर गया बागान जिनमें श्रमिकों की एक बड़ी संख्या काम कर रही थी अनिवार्यतः पूँजीमूलक उद्यम थे कृषि में भी पूँजीमूलक उत्पादन सम्बन्ध प्रकट हो गये थे यह बात रैयतवाडी (Riotwari) क्षेत्रों में भी विशेष रूप से दिखायी देती थी जमींदारी क्षेत्रों में भी समृद्ध काश्तकार, कृषक तथा जमींदार खेती कार्यों के लिए अधिकाधिक भाड़े के श्रमिकों को रखने लगे अन्य क्षेत्रों में भी इनकी संख्या लगातार बढ़ रही थी .

वास्तविक उत्पादन संबंध अलग-अलग रूप से पनप रहे थे तथा विकसित हो रहे थे परिणामस्वरूप स्वतन्त्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था एक अर्धसामन्ती (Semi-Feudal) अर्थव्यवस्था थी  .

पिछड़ी अर्थव्यवस्था:

भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटिश शासनकाल के समय काफी पिछड़ी हालत में थी देश की अधिकतर जनसंख्या, लगभग 74 प्रतिशत कृषि में लगी हुई थी .

संभावित रूप में ब्रिटिश शासन का आरंभिक प्रभाव यह पड़ा कि कृषि में लगी श्रम शक्ति की प्रतिशतता बढ़ गयी पूरे अंग्रेजी शासन काल में श्रम-शक्ति के वितरण में विशेष परिवर्तन नहीं हुए गैर कृषि क्षेत्र काफी छोटा था तथा इसकी संरचना भी काफी असंतुलित थी इस क्षेत्र में प्रमुख सेवाएँ व्यापार, ऋणदान, परिवहन प्रशासन, रक्षा व सामाजिक सेवाएँ आदि थी न कि उद्योग  उद्योग के अंतर्गत बहुसंख्यक घरेलू व लघुउद्योगों में लगी हुई थी इस प्रकार जहां विश्व के अन्य देशों में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) हुई वहाँ भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश ही रहा .

अर्थव्यवस्था की पिछड़ी दशा के मुख्य कारण निम्न थे प्रथम, प्रतिव्यक्ति आय न्यूनतम थी और इसका वितरण भी असमान था इसी कारण देश की अधिकतर जनसंख्या निर्धनता, निरक्षरता, दरिद्रता, अस्वस्थता, बेरोजगारी आदि से पूर्णतया ग्रसित थी ब्रिटिश काल में देश में बार-बार अकाल पड़े, जिससे लोगों में भुखमरी फैल गयी द्वितीय, देश की निर्धनता तथा पिछड़ेपन का इस बात से भी पता चलता था कि देश में व्यापक निरक्षरता थी तथा जन्म व मृत्यु-दरें भी ऊँची थी 1941 में 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों को छोड़कर शेष जनसंख्या के 17 प्रतिशत व्यक्ति ही साक्षर थे 1931-41 में जन्म-दर 45.2 प्रति हजार तथा 1911-21 के दशक में मृत्यु-दर 40 प्रति हजार से भी अधिक थी तीसरा, पिछड़ी अर्थव्यवस्था का एक कारण नगरीकरण (Urbanisation) के निम्न स्तर से भी प्रकट होता है, क्योंकि नगरों की विकसित अवस्था विकसित अर्थव्यवस्था का परिचायक है ब्रिटिश शासन के अधीन कृषि प्रधान अर्थव्यस्था होने के कारण भारत मुख्यतः गांवों का देश रहा अंततः, अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन का एक कारण यह भी था कि भारत आर्थिक विकास के लिए आवश्यक मशीनों और उपकरणों के लिए शेष संसार पर पूर्णतः निर्भर था यहाँ तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साधनों की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं के लिए भी देश को बाहरी संसार पर निर्भर रहना पड़ता था .

गतिहीन अर्थव्यवस्था :

ब्रिटिश शासन के अधीन अर्थव्यस्था वड़ी धीमी गति से चल रही थी लगभग एक शताब्दी के दौरान प्रतिव्यक्ति आय की औसत वार्षिक संवृद्धि 0.5 प्रतिशत से अधिक नहीं थी इस सदी के अन्तिम दशकों में जनसंख्या में त्वरित वृद्धि के कारण इस दर को बनाए रखना भी कठिन हो गया उपनिवेशी और सामंती शोषण के अन्तर्गत किसी भी प्रकार से विकास की आशा नहीं थी और यही असली गतिहीनता की स्थिति थी .

विहसित अर्थव्यवस्था :

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अर्थव्यवस्था का गम्भीर क्षय हुआ युद्धकालीन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मशीनरी और उपस्करों का अधिकाधिक प्रयोग हुआ परिणामस्वरूप भारी घिसाई और टूट फूट हुई परन्तु उनके प्रतिस्थापन प्राप्य नहीं थे और आवश्यक मात्रा में उनका आयात भी संभव नहीं था जिसके फलस्वरूप भौतिक परिसम्पत्तियों (Assets) का गम्भीर हास और क्षय है इन्ही सब कार से पारियों और उत्पादकों को स्टाक सूचियों में भी हास हुआ इस प्रकार अग्रेज एक अति विहसित और क्षीण अर्थव्यवस्था छोड़ गये .

विच्छेदित अर्थव्यवस्था :

देश का विभाजन ब्रिटिश शासको का विदाई प्रहार था पूर्ववती लगभग 100 वर्षों के दौरान आर्थिक एकीकरण ने काफी प्रगति कर ली थी अंग्रेजों ने देश के विभिन्न भाषा-भाषी, धार्मिक तथा सांस्कृतिक वर्गों में भावनात्मक एकता का संवद्धन करने के बजाय ‘फूट डालो और राज्य करो’ की नीति का सहारा लिया और साम्प्रदायिक (Communal) शक्तियों को हवा दी भारतीय लोग इस चुनौती का मुकाबला नहीं कर सके स्वतंत्रता प्राप्ति की आवश्यक कीमत के रूप में देश का विभाजन इसका अनिवार्य परिणाम था .

पूर्व में प्राप्त किए हुए आर्थिक एकीकरण में तथा अर्थव्यवस्था पर विभाजन का प्रभाव कुछ ऐसा था जैसे बिना हाथ और पैर का मानव विभाजन के परिणामस्वरूप उत्पन्न गड़बड़, फसाद, लूटमार, कत्लेआम तथा लोगों के स्थानान्तरण के कारण भी अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई ब्रिटिश उपनिवेशवाद की विदाई वास्तव में एक सख्त और चौंका देनेवाला प्रहार था जिसके प्रभाव लम्बे समय तक अर्थव्यवस्था में रहे हैं .

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