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जनसंख्या और आर्थिक विकास (Population and Economic Development)

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जनसंख्या और आर्थिक विकास (Population and Economic Development)

जनसंख्या और आर्थिक विकास (Population and Economic Development)

प्रत्येक समाज के लिए जनसंख्या का प्रश्न महत्वपूर्ण है. प्रायः सामाजिक तथा आर्थिक शोध में इस ओर काफी ध्यान दिया जाता है. जनसंख्या जहां एक ओर श्रम-शक्ति के स्रोत के रूप में आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण कारक है, वहीं दूसरी ओर अति जनसंख्या (Over-Population) आर्थिक विकास में बाधा डालती है.

भारत में जनसंख्या : जनांकिकी प्रवृत्तियां

जनसंख्या की दृष्टि से भारत (India) विश्व का दूसरा बड़ा देश है. भारत का भू-क्षेत्र संसार के भू-क्षेत्र का लगभग 2.4 प्रतिशत और यहां की जसंख्या विश्व की जनसंख्या की 16.2 प्रतिशत है 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1 अरब 2 करोड़ थी. पिछले 50 वर्षों में जिस तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उससे जन सघनता (Density of Population) 117 प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 324 प्रति वर्ग किलोमीटर हो गई है. इस समय देश में अति-जनसंख्या (Over Population) की स्थिति है जो देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा है.

जन्म और मृत्यु दरें :

जनसंख्या वृद्धि की दर मुख्य रूप से जन्म-दर और मृत्यु-दर पर निर्भर होती है. 1911 में जन्म-दर और मृत्यु-दर क्रमशः 49.2 प्रति हजार तथा 48.6 प्रति हजार थी जो 1997-98 में घटकर क्रमशः 27.4 और 8. 9 प्रति हजार रह गयी है. इस प्रकार स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार से मृत्यु-दर तेजी से कम हुई है, लेकिन जन्म-दर आज भी अधिक है. 1916-20 में बाल मृत्यु-दर प्रतिहजार 218 थी, आज यह घटकर 90 प्रतिहजार रह गयी है. निमोनिया, डायरिया, चेचक तथा ठूत के अन्य रोगों पर नियंत्रण से बाल मृत्यु-दर नीचे आनी स्वाभाविक थी. पिछले चार दशकों में जन्म-दर में केवल 26.7 प्रतिशत कमी हुई हैं भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर 1.93 प्रतिशत वार्षिक है. अनुमान है कि देश में जन्म-दर में महत्वपूर्ण कमी होने में कम-से-कम 20-30 वर्ष तो लग ही जाएंगे.

भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण

भारत में मुख्यरूप से जनसंख्या वृद्धि के दो कारण हैं : मृत्युदर में भारी कमी और जन्म-दर का ऊँचा रहना.

A. मृत्यु-दर में गिरावट के कारण

विभिन्न सर्वेक्षणों, आंकड़ों और गांव तथा शहरों के अध्ययनों से मृत्युदर में कमी के कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं .

1. अकालों में कमी :

ब्रिटिश काल में मृत्यु-दर ऊँची रहने का एक मुख्य कारण बार-बार अकालों का पड़ना था. आजादी के बाद इस दृष्टि से अनेक उपाय किए गए हैं. सूखा और फसल खराब होने की स्थिति में राहत कार्य जिस तेजी से किए जाते हैं उससे जान-माल का ज्यादा नुकसान नहीं होता. 1985-86 की तुलना में 1987-88 में खाद्यान्नों के उत्पादन में 7.5 प्रतिशत कमी होने के बावजूद भी सरकार ने आसानी से स्थिति को संभाल लिया था.

2. महामारियों पर नियंत्रण :

स्वतंत्रता से पहले देश में प्लेग, हैजा, चेचक आदि का भारी प्रकोप रहता था. इन महामारियों से मरने वालों की संख्या बहुत अधिक होती थी. अब इन महामारियों पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है. हैजे से 1925 में लगभग 5 प्रतिशत मौतें हुई थी. इसकी तुलना में 1967 में हैजे से मरने वालों का प्रतिशत केलव 0.4 था. नवम्बर 1994 में देश में कई स्थानों पर प्लेग की स्थिति रही, लेकिन इस पर जल्दी और आसानी से नियंत्रण पा लिया गया.

3. मलेरिया और तपेदिक की व्यापकता में कमी :

आजादी के बाद मलेरिया सम्बन्धी स्थिति में विशेष परिवर्तन हुआ है. इस शताब्दी के चौथे दशक में जब मृत्यु-दर लगभग 31 प्रति हजार थी, तब मलेरिया से मरने वालों की संख्या 16 प्रतिशत थी. अब मृत्यु-दर 8.9 प्रति हजार है. मृत्यु-दर में इस कमी के लिए मलेरिया काफी हद तक जिम्मेदार है. तपेदिक की रोकथाम में अपेक्षाकृत कम सफलता मिली है.

4. अन्य कारण :

उपर्युक्त मुख्य कारणों के अतिरिक्त अन्य कारणों के बारे में जानकारी अधिक नहीं है, लेकिन पीने के लिए शुद्ध जल की आपूर्ति बढ़ी है. शिक्षा और चिकित्सा का विस्तार हुआ है, जिससे अन्य बीमारियों की भी रोकथाम हुई है. फलस्वरूप मृत्यु-दर नीची हुई है.

B. जन्म-दर ऊँची होने के कारण

भारत में जन्म-दर अब भी ऊंची है और यह आशा कि परिवार नियोजन कार्यक्रम के फलस्वरूप यह नीची होगी, निराधार सिद्ध हुई है. पिछले चार दशकों में जन्म-दर में विशेष कमी नहीं हुई है. इसके मुख्य कारण देश में अनेक आर्थिक और सामाजिक कारक ऊँची जननक्षमता (Fertility) के पक्ष में है.

आर्थिक कारक :

मनुष्य का व्यवहार तथा जनन क्षमता भी आर्थिक कारकों से प्रभावित होती है. प्रमुख आर्थिक कारक निम्न हैं.

1. कृषि की व्यापकता :

भारत का मुख्य व्यवसाय कृषि है. खेती पर लगे लोगों के लिए बच्चे लम्बे अर्से तक भार नहीं होते क्योंकि ये छोटी उम्र में ही कृषि कार्यों में हाथ बटाने लगते हैं. भारत में खेती की तकनीक पिछड़ी है. जहाँ कृषि कार्य में ज्यादा श्रम की आवश्यकता होती है. ऐसी स्थिति में जन्मदर ऊंची होना स्वभाविक है.

2. ग्रामों की प्रधानता :

विकसित देशों की तुलना में भारत में नगरों की संख्या तथा उनमें रहने वाली जनसंख्या का अनुपात बहुत कम है. भारत में 27.8 प्रतिशत शहरी जनसंख्या की तुलना में इंग्लैंड व जर्मनी में क्रमशः 92 प्रतिशः ओर 86 प्रतिशत भाग शहरों में निवास करता है. शहरों में आवास सत्या, बच्चों का महंगा लालन-पालन, संयुक्त परिवार को टूटना आदि वे बहुत सारे कारण हैं जिनसे जन्म-दर में कमी होती है. अनेक विद्वानों का मानना है कि औद्योगीकरण बढ़ने के साथ भारत में जन्म-दर कम होगी.

3. गरीबी :

जनसंख्या का माल्थसवादी सिद्धान्त यूरोप में काफी पहले गलत मानकर त्याग दिया गया था, लेकिन अल्पविकसित देशों में गरीवी की व्याख्या हेतु अति-जनसंख्या को आधार बनाकर उसका इस्तेमाल फिर से किया जाने लगा है. भारत के सन्दर्भ में इस दृष्टि से वेरा एस्टें (Vera Anstey) लिखती हैं, उत्पादकता में वृद्धि, आर्थिक संगठन में सुध लोगों के स्वास्थ्य को प्रोत्साहन और औद्योगीकरण की दिशा में प्रगति चाहे जितनी क्यों न हो, जनसाधारण का जीवन-स्तर एक संतोषजनक स्तर पर तब तक नहीं पहुंचेगा और न पहुंचाया जा सकता है जब तक कि जनसंख्या का आकार आर्थिक संसाधनों के साथ ठीक ढंग से सामजित (Adjusted) नहीं होगा. विश्व बैंक के प्रकाशन ‘वर्ल्ड डवलपमेंट रिर्पोट 1984′ के अनुसार भी, “गरीब माता-पिताओं के लिए बच्चों की परवरिश की लागत नीची होने के ठोस कारण हैं जबकि बच्चों से लाभ ज्यादा हैं, इसीलिए ज्यादा बच्चे होना आर्थिक दृष्टि से विवेकपूर्ण है.” भारत में यह प्रवृत्ति नीचे वर्ग के परिवारों में देखने में आती है.

सामाजिक कारक :

भारत में ऊंची जन्मदर के लिए सामाजिक कारक भी जिम्मेदार हैं. इनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-

1. विवाह की व्यापकता :

भारत में विवाह एक धार्मिक एवं सामाजिक आवश्यकता है. यहां परम्परा के अनुसार माता-पिता अपनी कन्याओं का विवाह करना अपना कर्तव्य समझते हैं. यहां लोगों के दृष्टिकोण बदलने में अभी समय लगेगा तभी जनसंख्या वृद्धि पर कुछ रोक लगेगी.

2. विवाह के समय कम उम्र होना :

भारत में 1981 में स्त्रियों की विवाह के समय औसत-आयु 18.33 वर्ष थी. जनसंख्या विशेषज्ञों की राय में स्त्रियों का कम उम्र में विवाह उनकी ऊंची जननक्षमता का कारण है. एन.सी. दास की जांच से पता चला है कि 20 से 24 वर्ष के बीच में विवाह करने वाली स्त्रियों की जननक्षमता 20 वर्ष से कम उम्र में विवाह करने वाली स्त्रियों के बराबर ही होती है. जब विवाह की उम्र 25 या अधिक होती है तभी जननक्षमता कुछ कम होती है.

3. धार्मिक और सामाजिक अन्ध-विश्वास :

साधारण भारतीय की दृष्टि में सन्तान का जन्म ईश्वर की कृपा है. धार्मिक और सामाजिक अन्धविश्वासों के कारण साधारणतया सभी भारतीय सन्तान की इच्छा रखते हैं. अधिकतर व्यक्ति पुत्र-जन्म की इच्छा से उस समय तक सन्तानोत्पत्ति करते रहते हैं, जब तक कि उनकी मनोकामना पूरी नहीं हो जाती.

4. शिक्षा का अभाव :

2001 की जनगणना के अनुसार 65.38 प्रतिशत लोग साक्षर थे. स्त्रियों में यह प्रतिशत 54.16 जबकि पुरुषों में 75.85 प्रतिशत था. स्त्रियों में साक्षरता प्रायः शहरी क्षेत्रों में केन्द्रित है. अनेक अर्थशास्त्रियों की राय है कि केवल शिक्षा से ही परिवार, विवाह और बाल-जन्म के विषय में लोगों के विचार बदले जा सकते हैं.

आर्थिक क्षेत्र में औद्योगीकरण की प्रक्रिया जितनी तेज होगी, उसके साथ-साथ शहरों का विकास होगा और अन्नतः जन्मदर में कमी होगी. शिक्षा के प्रसार से परिवार तथा विवाह सम्बन्धी दृष्टिकोणों में परिवर्तन होंगे और सन्तति निरोध के उपाय अधिक लोकप्रिय होंगे. जिससे जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी पड़ेगी.

भारत में अति-जनसंख्या की समस्या

इसमें सन्देह नहीं कि भारत में जनसंख्या में होने वाली वृद्धि एक गम्भीर समस्या है. विकास योजनाओं से कुछ महत्वपूर्ण सफलता की आशा तभी की जा सकती है जब बढ़ती जनसंख्या को रोकने के कारगर उपाय किए जायें .

भारत में जनसंख्या की अधिकता सिद्ध करने वाले विद्वानों ने मुख्य रूप से माल्थस (Malthus) के जनसंख्या सिद्धान्त को अपने तर्क का आधार बनाया है. इसके लिए निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं.

1. प्राकृतिक अवरोधों की उपस्थिति :

माल्थस के अनुसार ऊंची जन्मदर, मृत्युदर तथा प्राकृतिक अवरोधों की उपस्थित अतिजनसंख्या के लक्षण माने जा सकते हैं. भारत में जन्मदर ऊंची है. मृत्यु-दर में कमी हो रही है, लेकिन पश्चिमी देशों की तुलना में यह अब भी बहुत ऊंची है. इनके अतिरिक्त और भी अनेक कारण हैं जो इस बात का सबूत हैं कि देश में जनसंख्या अधिक हैं.

2. खाद्यपदार्थों के उत्पादन में धीमी गति से वृद्धि :

बीसवीं शताब्दी से आज तक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में 21 प्रतिशत वृद्धि तथा कषि के अन्तर्गत केवल 11 प्रतिशत क्षेत्र बढ़ा है. प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी कोई वृद्धि नहीं हुई है. प्रथम दो पंचवर्षीय योजनाओं में खाद्य पदार्थों के उत्पादन में वृद्धि दर जनसंख्या वृद्धिदर से अधिक थी. लेकिन इसके तुरन्त बाद पुनः खाद्य समस्या उत्पन्न हो गयी थी. इस समय भारत खाद्यान्न की दृष्टि से आत्मनिर्भर है, लेकिन शहरों में राशनिंग होना इस बात का प्रमाण है कि स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है.

3. बेरोजगारी की व्यापकता :

पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत रोजगार के नए अवसर पैदा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन फिर भी बेरोजगार लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. प्रथम और द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं में क्रमशः 50 और 66 लाख व्यक्तियों को रोजगार दिया गया, लेकिन योजना आयोग के अनुसार अप्रैल 1997 में लगभग 7 करोड़ व्यक्ति पूरे दिन के काम की खोज में थे.

4. नीचा जीवन स्तर :

भारतीय लोगों का जीवन स्तर बहुत नीचा है. यहां 2001 में प्रतिव्यक्ति आय केवल 460 डालर थी जो कई अन्य विकासशील राष्ट्रों की प्रतिव्यक्ति आय से भी कम थी. | निश्चय ही भारत में जनसाधारण गरीब है, लेकिन कुछ विद्वान यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यदि देश की जनसंख्या कुछ कम होती तो देश में बेरोजगारी, भूखमरी और अकाल आदि की स्थिति नहीं होती. दरअसल इन सब का संबंध देश के आर्थिक ढांचे से है. यदि देश में आर्थिक और प्राकृतिक स्रोतों का आवंटन ठीक नहीं है और उत्पादन का प्राथमिक क्रम गलत है तो खाद्य समस्या उत्पन्न होगी. बेरोजगारी का संबंध दोषपूर्ण आर्थिक आयोजन से है. लेकिन ऊंची जन्मदर और वर्तमान जनसंख्या भी ऐसे तत्त्व हैं जो आर्थिक विकास में बाधक हैं.

जनसंख्या सम्बन्धी नीति

भारत में इस समय जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है. इस पर नियंत्रण के लिए एक स्पष्ट नीति आवश्यक है. भारत में परिवार नियोजन को सरकारी नीति का अंग माना गया है. निश्चय ही जनसंख्या की समस्या का हल सन्तति निरोध के उपकरणों का उत्पादन बढ़कर नहीं हो सकता. इसके लिए लोगों में चेतना की आवश्यकता है. शिक्षा के प्रसार और अनुकूल आर्थिक दशाओं को उत्पन्न कर परिवार नियोजन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकता है.

पंचर्वीय योजनाओं के अन्तर्गत परिवार नियोजन :

समीक्षा: पहली तीन पंचवर्षीय योजनाओं में परिवार नियोजन के कार्यक्रमों पर कुल 32 करोड़ रुपया व्यय किया गया था. 1966 में तीसरी योजना की समाप्ति के समय देश में 1,381 नगर परिवार कल्याण नियोजन केन्द्र और 3,676 ग्रामीण परिवार कल्याण नियोजन केन्द्र कार्य कर रहे थे. इसके अलावा गांवों में 7,081 उप-परिवार कल्याण नियोजन केन्द्र भी थे. इन कल्याण केन्द्रों का कार्य परिवार नियोजन के सम्बन्ध में सलाह देने के अतिरिक्त संतति निरोध के लिए सेवाएं भी प्रदान करना था. देश की विशालता और समस्या की गम्भीरता को देखते हुए ये सुविधाएं बहुत थोड़ी थीं. अप्रैल 1966 में केन्द्र और राज्य सरकारों के कार्यक्रमों में तालमेल बैठाने के उद्देश्य से परिवार नियोजन के कार्यक्रमों पर. लगभग 70.46 करोड़ रुपए व्यय किए गए जो पहली तीन योजनाओं में कुल व्यय का ढाई गुना था.

चौथी योजना में परिवार नियोजन के कार्यक्रमों पर 284 करोड़ रुपए व्यय किए गए. इसमें से अधिकांश ग्रामीण एवं शहरी परिवार नियोजन केन्द्रों दारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं पर और शेष प्रशिक्षण, प्रचार और शोध कार्यों पर व्यय किया गया. पाँचवी योजना में भी परिवार नियोजन कार्यक्रम को पाथमिकता दी गयी तथा योजना में इस कार्यक्रम पर 497 करोड़ रुपए व्यय करने की व्यवस्था थी. लेकिन योजना के चार वर्षों में व्यय राशि 384 करोड रुपए थी. इस योजना की उल्लेखनीय बातें, परिवार नियोजन कार्यक्रम को स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ जोड़ा गया, इस कार्य के प्रति लोगों की जानकारी बढ़ाने के लिए अनेक उपाय किए गए तथा मृत्युदर घटाने के प्रयास भी किए गए.

छठी योजनाओं के अन्तर्गत जनसंख्या :

छठी योजना के अन्तर्गत जनसंख्या सम्बन्धी नीति से सम्बद्ध तथा योजना आयोग द्वारा नियुक्त कार्यकारी दल ने सिफारिश की थी कि 1996 तक इस देश में शुद्ध जनन दर (Net Reproduction Rate) गिरकर 1.0 रह जानी चाहिए. योजना आयोग के अनुसार 1980-81 में यह 1.67 थी. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित दिशाओं में प्रगति होनी चाहिए

  1. परिवार का आकार 4.2 बालकों से घटाकर 2.3 करना होगा,
  2. जन्मदर को 33 प्रति हजार से घटाकर 21 प्रति हजार करना होगा,
  3. मृत्युदर को घटाकर 14 प्रति हजार से 9 प्रति हजार करना होगा,
  4. कम से कम 60 प्रतिशत दम्पत्तियों को परिवार नियोजन के दायरे में लाना होगा.

सातवीं योजना में परिवार नियोजन सम्बन्धी युक्ति और कार्यक्रम :

इस समय देश को 38 प्रतिशत जनसंख्या 15 से कम आयु वर्ग में है. इसका यही अर्थ नहीं है कि देश की उत्पादक जनसंख्या पर बच्चों का काफी भार है, बल्कि इसका यह भी अर्थ है कि आने वाले वर्षों में जब ये बालक पुनरुत्पादन आयु-वर्ग (Reproductive Age Group) में पहुँचेगे तो देश की जनसंख्या और भी तेजी के साथ बढ़ सकती है. इसलिए सातवीं योजना में जनसंख्या वृद्धि को रोकना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था. इस योजना में परिवार नियोजन कार्यक्रम को लोगों का जीवन अच्छा बनाने के लिए समग्र राष्ट्रीय प्रयास (Total National Efforts) के रूप में अपनाया गया था. साथ ही इस योजना में छठी योजना द्वारा निर्धारित लक्ष्य 1996 तक देश में शुद्ध पुनरुत्पादन दर 1.0 लाने के लिए आगे प्रयास किये गये. परिवार नियोजन कार्यक्रम की बुनियादी संरचना में सुधारकर कार्यक्रम को ज्यादा असरदार बनाने की कोशिश की गई थी.

आठवीं योजना में परिवार नियोजन सम्बन्धी युक्ति और कार्यक्रम :

सातवीं योजना में परिवार नियोजन कार्यक्रम को ज्यादा सफलता नहीं मिली और इसीलिए जनसंख्या वृद्धि की दर आशा के अनुरुप नीचे नहीं आयी. आठवीं योजना में जन्मदर को 26 प्रति हजार तक लाने का लक्ष्य रखा गया. परिवार नियोजन कार्यक्रम को सभी विवादों से ऊपर रखने की तथा राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप देने की बात कही गई है. सामान्य शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ शिक्षा में स्वास्थ्य और पुनरुत्पादन सम्बन्धी जीवन विज्ञान पर जोर दिया जाएगा. परिवार नियोजन के अन्तर्गत आवश्यक सेवाएं प्रदान करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन केन्द्र और उपकेन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र खोले जाएंगे.

नौवीं पंचवर्षीय योजना-नई युक्ति :

नौवीं पंचवर्षीय योजना में केन्द्रीय सरकार की भूमिका सीमित कर दी गई है. अब केन्द्रीय सरकार केवल सामान्य नीति आयोजन करने के साथ-साथ परिवार नियोजन प्रौद्योगिकी सम्बन्धी जानकारी प्रदान करेगी. अतः अब सरकार का दृष्टिकोण है कि लोग परिवार नियोजन कार्यक्रम को सरकार के सहयोग से क्रियान्वित करें. परिवार | नियोजन युक्ति का एक अन्य पहलू यह है कि युवा दंपत्तियों पर जो पुनरूत्पादन की दृष्टि से सर्वाधिक सक्रिय हैं, ध्यान केन्द्रित किया जाये. यह इसलिए आवश्यक समझा गया है, क्योंकि सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान दंपत्ति संरक्षण दर का लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद भी उसके अनुरूप जन्म दर में कमी नहीं हुई. ऐसा संभवतः इसलिए हुआ कि युवा दम्पत्तियों का संरक्षण अनुपात कम रहा. अब युवा दंपत्तियों को छोटा परिवार अपनाने के लिए तैयार किया जाएगा. उन्हें यह समझाने का कार्यक्रम चलाया जाएगा कि छोटा परिवार रखना उनका सामाजिक दायित्व है. भविष्य में परिवार नियोजन कार्यक्रम का लक्ष्य दंपत्ति संरक्षण दर के रूप में निर्धारित करने के बजाय जन्म दर में कमी के रूप में निर्धारित किया जाएगा और कार्यक्रम का स्वरूप भी इसी के अनुरूप बनाया जाएगा. इस दृष्टि से परिवार नियोजन सेवाओं की पहुँच और कोटि में सुधार किया जाएगा. अभी तक बंध्याकरण कार्यक्रम को स्वीकार करने वाले लोगों को मौद्रिक प्रेरणा की व्यवस्था से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता नहीं मिली है. अतः पुरस्कार और प्रेरणाओं की संपूर्ण व्यवस्था को अधिक अर्थपूर्ण बनाकर पुनर्गठित करना होगा. परिवार नियोजन कार्यक्रम न अपनाने वाले लोगों के लिए कुछ सामान्य सुविधाओं में कटौती के प्रावधान, शिक्षा सूचना आदि का महत्व अब समीक्षा जाने लगा है. आयोजक अब परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता के लिए इनके महत्त्व को स्वीकार करने लगे हैं. अतः आनेवाले वर्षों में इनका विस्तार किया जाएगा. स्त्री-पुरुषों की प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करने वाले उपायों से संबंधित शोध और विकास (Research and Development) कार्यों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (2002)

राष्ट्रीय जनतान्त्रीक गठबंधन सरकार ने 15 फरवरी, 2000 को राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (2000) की घोषणा की जिसका उद्देश्य दो-बच्चों के मानक (Norm) को प्रोत्साहित करना था ताकि सन् 2046 तक जनसंख्या को स्थिर किया जा सके. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-

प्रथम, सरकार ने यह निर्णय किया है कि संविधान के 49वें संशोधन के अनुसार 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों पर लगाए गए प्रतिबन्ध को जो सन् 2001 तक मान्य था, बढ़कर सन् 2026 तक बढ़ा दिया जाए. यह इसलिए किया जा रहा है कि तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों जिन्होंने छोटे परिवार के मानक का प्रभावी रूप में अनुसरण किया है को दण्डित न किया जाए और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को लोकसभा में अधिक सीटें देकर पुरस्कृत न किया जाए. अतः लोकसभा की सीटों को सन् 2026 तक जड़ीकृत करने का उद्देश्य जनसंख्या नीति की उपेक्षा करने वाले राज्यों को पुरस्कार न देना है और जो राज्य छोटे परिवार के मानक का सफलतापूर्वक पालन करते रहे हैं उन्हें दण्ड न देना है.

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति में सन् 2046 तक स्थिर जनसंख्या का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपायों का उल्लेख किया गया है

  1. प्रति 1,000 जीवित जन्मे बच्चों के लिए शिशु मृत्युदर को 30 से कम करना,
  2. मातृ मृत्युदर (Metermal Mortality Rate) को 1,00,000 जीवित जन्मों के लिए 100 से भी कम करना,
  3. सर्वव्यापक प्रतिरक्षण (Universal Immunization),
  4. 80 प्रतिशत प्रसवों (Deliveries) के लिए प्रशिक्षत स्टॉफ के साथ नियमित डिस्पेन्सरियों, हस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों का प्रयोग करना,
  5. एड्स (AIDS) के बारे में सूचना उपलब्ध कराना, संक्रामिक रोगों का प्रतिबंधित और नियंत्रित करना,
  6. दो बच्चों के छोटे परिवार के मानक को अपनाने के लिए प्रोत्साहित देना,
  7. सुरक्षित गर्भपात की सुविधायों को बढ़ाना,
  8. शिशु विवाह प्रतिबन्ध कानून और जन्म-पूर्व लिंग-निर्धारण तकनीक कानून का कड़ाई से पालन करना,
  9. लड़कियों की विवाह आयु को 18 वर्ष के ऊपर उठाना और बेहतर तो यह है कि इसे 20 वर्ष से भी अधिक करना,
  10. ऐसी स्त्रियों को जो 21 वर्ष की आयु के पश्चात् विवाह करें और दूसरे बच्चे के जन्म के पश्चात् गर्भधारण समाप्ति करने के उपाय को स्वीकार कर लें, विशेष पुरस्कार देना,
  11. चिकित्सा की भारतीय पद्धति का प्रजनन (Reproduction) और बाल स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था के लिए समन्वय करना,
  12. गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले ऐसे व्यक्तियों को जो दो बच्चों के पश्चात् बन्ध्यकरण या नसबन्दी (Sterilization) करवा लेते हैं, स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना, और .
  13. जनसंख्या नीति के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में जनसंख्या पर एक राष्ट्रीय आयोग (National Commission on Population) नियुक्त करना. इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण की समस्याओं के बारे में अधिक ध्यान केन्द्रित करना है. चूंकि भारत 100 करोड जनसंख्या के निशाने को पहले ही पहुँच चुका है, इसलिए राष्ट्रीय जनसंख्या नीति सन् 2010 तक परिवार नियोजन उपायों को तेजकर इसे 110 करोड़ तक सीमित करना चाहती है.

अगले 10 वर्षों के लिए इसके लिए जो कार्य-योजना तैयार की गयी है, उसमें निम्नलिखित बातें शामिल की गयी है, उसमें निम्नलिखित बातें शामिल की गयी हैं-

  1. ग्राम-पंचायत स्तर स्वयं-सहायता समूहों (Subhelp Groups) जिनमें अधिकतर गृहणियां शामिल हैं, स्वास्थ्य देखभाल करने वाले कामगारों और ग्राम-पंचायतों के साथ विचार-विमर्श करना.
  2. प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाना होगा.
  3. जन्म और मृत्यु के साथ विवाहों और गर्भ के पंजीकरण को अनिवार्य बनाना होगा.

सरकार यह आशा करती है की सन् 2046 तक जनसंख्या स्थिरीकरण (Population Stabilisation) के उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी. अभी फौरी रूप में आधार-संरचना (Infrastructure) को उन्नत करने के लिए 3,000 करोड़ रूपये का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है ताकि गर्भ-निरोध की अभी तक न पूरी की गयी जरूरतों की ओर ध्यान दिया जा सके. | मोटेतौर पर जनसंख्या नीति को सही दिशा में कदम माना गया है. माईकल ब्लैसौफ, . यू.एन.एफ.पी.ए. (UNFPA) के प्रतिनिधि ने उल्लेख किया है: “यह नीति सरकार की जनसंख्या सम्बन्धी चिन्ताओं का स्पष्ट प्रमाण है.’ इस नीति में जबकि उपायों का प्रयोग न कर के * सकारात्मक उपायों” पर अधिक निर्भरता रखी गयी है.

किन्तु आलोचकों का आरोप है कि नयी जनसंख्या नीति परिवार-परिसीमन का सारा भार “स्त्रियों पर डाल रही है. भारतीय परिवार नियोजन संस्था की अध्यक्ष डा. नीना पुरी ने सरकार की आलोचना करते हुए कहाः “यह नीति पुरूष-सहसांग पर “नरम” है. नयी नीति का सन्देश यह है कि जनसंख्या-नियंत्रण का भार स्त्रियां सहेंगी और पुरुष बड़ी आसानी से उसके द्वारा मुक्त कर दिए गए हैं.” नीति में केवल स्त्रियों के लिए गर्भधारण की समाप्ति के उपायों को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहनों की व्यवस्था है. यह कहीं बेहतर होता यदि नीति में दो बच्चों के बाद नसबन्दी (Sterilisation) कराने के लिए पुरुषों को भी इस प्रकार के प्रोत्साहन उपलब्ध कराए जाते. उस तर्क में काफी बल है. और सरकार को प्रोत्साहनों के बारे में संशोधन करना चाहिए ताकि परिवार के दोनों साक्षीदारों-पुरुष एवं स्त्री पर जनसंख्या नियंत्रण का भार समान रूप से डाला जा सके.

जनसंख्या सम्बन्धी नीति का मूल्यांकन

भारत में भी कई अन्य अल्पविकसित देशों की भांति “जनसंख्या विस्फोट” की स्थिति है. अतः जनसंख्या नियंत्रण के लिए जन्मदर पर नियंत्रण की दिशा में हर संभव कोशिश की जानी चाहिए. लेकिन आज भी देश की जनसंख्या-नीति काफी दोषपूर्ण है.

1. संतति निरोध के उपकरणों पर अनावश्यक जोर दिया जाना :

भारत में समस्या को ठीक ढंग से नहीं समझा गया है. अब तक संतति निरोध उपकरणों का उत्पादन बढ़ाकर और प्रतिबंध अवरोधों को प्रोत्साहन देकर समस्या को हल करने की असफल कोशिश की गयी है. इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है कि जनसंख्या समस्या में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में जनसाधारण के जीवन स्तर को ऊँचा उठाया जाए.

2. परिवार नियोजन कार्यक्रम में अनिवार्य बंध्याकरण की अनुपयुक्तता :

इसमें सन्देह नहीं है कि जन्मदर को नीचे लाना राष्ट्रीय दृष्टि से काफी आवश्यक है और इसे सरकारी आयोजन में ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए. दरअसल विकास और परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रतियोगी न होकर एक दूसरे के पूरक हैं जो मिलकर जन्मदर को नीचे ला सकेंगे. लेकिन प्रवीण विसारिया कहते हैं “प्रत्येक दम्पत्ति को अपने लिए परिवार नियोजन का उपाय चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. अर्थात् अनिवार्य बंध्याकरण इस कार्यक्रम पर बुरा प्रभाव डालते हैं.”

3. परिवार नियोजन के सम्बन्ध में बदलते हुए दृष्टिकोण :

डी. बनर्जी के अनुसार भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम पूरी तरह असफल रहा है. उसके विचार से जन्मदर को 25 प्रति हजार तक लाने का लक्ष्य अभी बहुत दूर है. सरकार द्वारा ‘क्लीनिक दृष्टिकोण’ फिर ‘प्रयास दृष्टिकोण’ तथा इनकी असफलता के बाद “कैम्प दृष्टिकोण अपनाया गया जिसके अन्तर्गत लोगों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर कैम्पों में बंध्याकरण के लिए लाया जाता था. इसमें अनेक ऐसे व्यक्तियों का बंध्याकरण हुआ जिनके लिए यह जरूरी नहीं था. डी. बनर्जी के अनुसार देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तन के बाद ही जन्मदर नीची हो सकेगी.

भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए इस सम्बन्ध में कारगर उपाय करना बहुत जरूरी है. इसके लिए बुनियादी आधार पर संगठनात्मक सुधार किए जाने चाहिए, साथ ही गरीब लोगों को इस सम्बन्ध में शिक्षित करना होगा.

भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप (Nature of the Indian Economy)

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