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आर्थिक संवृद्धि और विकास (Economic Growth and Development)

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आर्थिक संवृद्धि और विकास (Economic Growth and Development)

आर्थिक संवृद्धि और विकास (Economic Growth and Development)

अल्पविकसित तथा विकसित अर्थव्यवस्थाएँ

पूर्व-प्रचलित शब्द अर्थात् पिछड़े (Backward) और उन्नत के स्थान पर अल्पविकसित और विकसित शब्दों के व्यवहार को श्रेयस्कर समझा जा रहा है. ‘पिछड़े'(Backward) शब्द की अपेक्षा ‘अल्पविकसित’ नरम शब्द है क्योंकि इसमें विकास

की संभावना पर बल दिया गया है. इसमें सन्देह नहीं कि अल्पविकसित और विकसित देशों का अन्तर एक प्रकार से अनियमित और कुछ हद तक मनमाना भी है. अल्पविकसित देशों के आर्थिक विकास के लिए उपाय सुझाने के उद्देश्य से नियुक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों के दल ने कहा है, “हमें ‘अल्पविकसित देश’ शब्द के अर्थ को समझने में कुछ कठिनाई हुई है. हमने इस शब्द का प्रयोग उन देशों के अर्थ में किया है जिनकी प्रति व्यक्ति वास्तविक आय (Per Capita Real Income) संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप की प्रति व्यक्ति वास्तविक आय (income) की तुलना में कम है. इस अर्थ में ‘निर्धन देश’ उपयुक्त पर्याय होगा. अतः ‘अल्पविकसित देश’ सापेक्ष शब्द है. सामान्यतः वे देश, जिनकी वास्तविक प्रति व्यक्ति आय संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय की एक-चौथाई से कम हैं अल्पविकसित देशों के वर्ग में रखे जाते हैं. . हाल ही के वर्षों में, इन अर्थव्यवस्थाओं को ‘अल्पविकसित’ कहने की बजाए संयुक्त राष्ट्र के प्रकाशनों में इन्हें ‘विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (Developing Economies) के रूप में सम्बोधित किया गया है. विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के शब्द से यह बोध होता है कि चाहे ये अर्थव्यवस्थाएं अल्पविकसित हैं किन्तु इनमें विकास-प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी हैं. इस प्रकार अर्थव्यवस्थाएं दो वर्गों में विभक्त की जाती हैं-‘विकासशील अर्थव्यवस्थाएं और “विकसित अर्थव्यवस्थाएं”.

विश्व बैंक ने अपनी World Development Report (2000/2001) में. प्रति व्यक्ति कुल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product) के आधार पर विभिन्न देशों का वर्गीकरण किया है. विकासशील देश तीन भागों में बांटे गए. हैं : (1) निम्न आय वाले देश जिनमें 1999 में प्रति व्यक्ति कुल राष्ट्रीय उत्पाद (Per capita GNP(755) डालर या इससे कम है; (2) मध्यम आय वाले देश जिनकी प्रति व्यक्ति आय 755 डालर से 9,265 डालर की अभिसीमा के बीच हैं; और (3) उच्च आय वाले देशों में आर्थिक सहयोग एवं विकास संस्था (Organisation for Economic Co-operation and Development OECD) के सदस्य एवं कुछ अन्य देश हैं जिनमें प्रति व्यक्ति उत्पाद 9,265 डालर या इससे अधिक है.

निम्नलिखित तालिका से पता चलता है कि जहां निम्न आय वाले देशों में 2000 में कुल विश्व जनसंख्या का 40.6 प्रतिशत निवास करता है, वहां उन्हें कुल विश्व राष्ट्रीय आय का केवल 3.3 प्रतिशत प्राप्त है. इसी प्रकार मध्यम आय वाले देशों में कुल विश्व जनसंख्या का लगभग 44.5 प्रतिशत रहता है. परन्तु उनको कुल विश्व आय का लगभग 17.0 प्रतिशत प्राप्त है. यदि इन दोनों को एक साथ जोड़ लें, तो ये ऐसे देश हैं जिन्हें आम भाषा  (language)में विकासशील अर्थव्यवस्थाएं’ या ‘अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएं’ कहते हैं, इन अर्थव्यवस्थाओं में विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत रहता है परन्तु इन्हें विश्व की कुल आय का लगभग 20 प्रतिशत प्राप्त होता है. इनमें एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका के अधिकतर देश और यूरोप के कुछ देश शामिल हैं. | इसके विरुद्ध, उच्च आय वाले देश जिनमें कुल विश्व जनसंख्या का 15 प्रतिशत निवास करता है, जो विश्व की कुल आय में लगभग 78 प्रतिशत है. जाहिर है कि विश्व अर्थव्यवस्था में आय का संकेन्द्रण उच्च आय वाले देशों अर्थात् विकसित अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में हो रहा है. इसके विरुद्ध, विश्व के अधिकतर गरीब निम्न आय एवं मध्यम आय वाले विकासशील देशों में रहते हैं. प्रोफेसर केरनक्रास (Cairn0Cross) के शब्दों में, “अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएं विश्व अर्थव्यवस्था की गन्दी बस्तियां हैं.”

2000 में भारत की जनसंख्या 101.6 करोड़ थी जो कि विश्व की कुल जनसंख्या का 16.8 प्रतिशत है परन्तु इसे विश्व आय का केवल 1.5 प्रतिशत प्राप्त था. इसका कारण भारत की प्रतिव्यक्ति आय का केवल 160 डालर होना है. जाहिर है कि भारत की गणना विश्व की निर्धन अर्थव्यवस्थाओं में की जाती है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में दी गई परिभाषा वास्तविक प्रति व्यक्ति आय पर ध्यान केन्द्रित करती है. यद्यपि यह परिभाषा विकसित और अल्पविकसित देशों के वर्गीकरण के लिए आधार प्रदान करती है, तथापि यह संकीर्ण है. युजिन स्टेली (Eugene Staley) ने अल्पविकसित देश की निम्नलिखित परिभाषा दी है: “वह देश जिसमें (1) व्यापक निर्धनता, जो कि स्थायी हो, न कि किसी अस्थायी विपद् का दुष्परिणाम हो और (2) उत्पादन तथा सामाजिक संगठन के अप्रचलित तरीकों (Obsolete Methods) का व्यवहार होता हो, जिसका अर्थ यह है कि निर्धनता पूर्णतया हीन प्राकृतिक संसाधनों के कारण नहीं है, बल्कि इसे अन्य देशों में परखे हुए तरीकों द्वारा संभवतः कम किया जा सकता है.” अल्पविकसित अर्थव्यवस्था की उपर्युक्त व्यापक परिभाषा से निम्नलिखित तथ्यों का संकेत मिलता है –

  1. अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकसित अर्थव्यवस्थाओं से भेद का आधार निम्न प्रति व्यक्ति आय है. यद्यपि प्रति व्यक्ति आय एकमात्र आधार नहीं है किन्तु फिर भी विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की तुलना के लिए अकेला यही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है.
  2. अल्पविकसित देशों की केन्द्रीय समस्या इनमें विद्यमान ‘व्यापक निर्धनता’ (Mass Poverty) है जो इनके विकास के निम्न स्तर का कारण भी है और परिणाम भी.
  3. व्यापक निर्धनता गरीबों के निम्न साधन-आधार (Low Resource| base) का परिणाम है. निर्धनों के पास भूमि, पूँजी, गृह-सम्पत्ति आदि के रूप में कुल परिसम्पत् का बहुत थोड़ा भाग होता है. निम्न साधन-आधार के कारण गरीब लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण (Training) दिलाने में असमर्थ रहते हैं. परिणामतः गरीबों के बच्चे या तो अकुशल व्यवसायों या अर्धकुशल व्यवसायों में काम करते हैं. इसके फलस्वरूप वे बहुत ही थोड़ी मजदूरी प्राप्त कर पाते हैं और इस कारण वे गरीबी में ग्रस्त रहते हैं. दूसरे शब्दों में, परिसम्पत् के वितरण में असमानता एक ओर आय के वितरण में असमानता का प्रधान कारण है और दूसरी ओर अवसरों के असमान वितरण का.
  4. अल्पविकसित देशों में व्यापक निर्धनता का कारण हीन प्राकृतिक संसाधन नहीं अपितु उत्पादन और सामाजिक संगठन के अप्रचलित तरीकों का व्यवहार है.

आर्थिक संवृद्धि, विकास और अल्पविकास

यद्यपि आर्थिक विकास (Economic development) के अध्ययन ने वाणिज्यवादियों तथा एड्म स्मिथ से लेकर माक्र्स और केन्ज तक सभी अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित किया था फिर भी उनकी दिलचस्पी प्रमुख रूप से ऐसी समस्याओं में रही जिनकी प्रकृति विशेषतया स्थैतिक थी, और जो अधिकतर सामाजिक (social ) और सांस्कृतिक संस्थाओं के पश्चिम यूरोपीय ढांचे से संबंध रखती थी. वर्तमान शताब्दी के पांचवे दशक में, विशेष रूप से दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही अर्थशास्त्रियों ने अल्पविकसित देशों की समस्याओं के विश्लेषण की ओर ध्यान देना शुरू किया. क्योंकि अब ये राष्ट्र शीघ्रता से आर्थिक विकास को बढ़ावा देना चाहते थे.

आर्थिक संवृद्धि :

आर्थिक संवृद्धि की एक सर्वमान्य परिभाषा देना मुश्किल है. आर्थिक संवृद्धि को हम एक ऐसी वृद्धि के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जो अत्यन्त नीचे जीवन स्तर में फंसी हुई हो और जो किसी अल्पविकसित अर्थव्यवस्था को अल्पावधि में ही हम ऊंचे जीवन स्तर पर पहुँचा सके. पहले से विकसित देश के लिए इसका अर्थ होगा विद्यमान संवृद्धि दरों को बनाये रखना. कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुस. आर्थिक संवृद्धि एक ऐसी प्रक्रिया है. जिसके द्वारा किसी अर्थव्यवस्था का कुल घरेलू उत्पादन (Gross Domestic Product) लगातार दीर्घकाल तक बढ़ता रहता है. साथ ही बहुत से अन्य अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक संवृद्धि को प्रतिव्यक्ति उत्पादन में वृद्धि के रूप में परिभाषित किया है. निष्कर्ष रूप में आर्थिक संवृद्धि को मापने का सर्वोत्तम तरीका प्रतिव्यक्ति उत्पादन में वृद्धि को मापना है.

आर्थिक विकास :

जहाँ आर्थिक संवृद्धि को घरेलू उत्पादन या प्रतिव्यक्ति उत्पादन में वृद्धि के रूप में मापा जाता है वहीं आर्थिक विकास में गुणात्मक पहलुओं पर विचारकर ‘विकास प्रक्रिया पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है.

आर्थिक विकास की परिभाषा प्रायः लोगों के भौतिक कल्याण में सुधार के रूप में की जाती है: जब जनसाधारण को अशिक्षा, बीमारी और छोटी उम्र में मृत्यु के साथ-साथ गरीबी से छुटकारा मिलता है, औद्योगीकरण प्रक्रिया तेज होती है. तथा कार्यकारी जनसंख्या का अनुपात बढ़ता है तो कहा जाता है कि देश विशेष में आर्थिक विकास हुआ है. प्रत्येक पिछड़ा देश आज आर्थिक विकास प्रक्रिया को सफल बनाने की कोशिश कर रहा है.

संवृद्धि और विकास :

संकल्पनाओं की तुलना: प्रायः अर्थशास्त्री आर्थिक विकास शब्द का प्रयोग अल्पविकसित देशों के लिए और आर्थिक वृद्धि शब्द का प्रयोग विकसित देशों के लिए करते हैं.

‘हिक्स’ (Hicks) के अनुसार “अल्पविकसित देशों की समस्याएँ उपयोग में न लाए गए साधनों के विकास से संबंध रखती हैं भले ही उनके उपयोग ज्ञात हों जबकि उन्नत देशों की समस्याएं वृद्धि से संबंधित रहती हैं जिनके बहुत सारे साधन पहले से ज्ञात( known) और किसी सीमा तक विकसित होते हैं.”

‘मैडिसन’ (Maddison) के अनुसार, “आय स्तरों को ऊंचा करना सामान्यतया अमीर देशों में आर्थिक संवृद्धि कहलाता है जबकि गरीब देशों में यह आर्थिक विकास कहलाता है.”

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में आर्थिक वृद्धि का संबंध देश की प्रतिव्यक्ति आय में एक मात्रात्मक निरंतर वृद्धि से है, दूसरी ओर आर्थिक विकास एक विस्तृत धारणा है. यह आर्थिक आवश्यकताओं, वस्तुओं, प्रेरणाओं और संस्थाओं में गुणात्मक परिवर्तनों से संबंधित है..

अल्पविकास : अर्थ एवं सूचक

पिछले तीन-चार दशकों में अर्थशास्त्रियों ने अल्पविकसित देशों की समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया है परन्तु ‘अल्प-विकास’ की एक सर्वमान्य परिभाषा दे सकना सहज नहीं है. संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक विषमताएं पाई जाती हैं जिससे अल्प-विकसित और विकसित के बीच विभाजन करने में कठिनाई आती है, फिर भी अल्प-विकास के कुछ महत्वपूर्ण मापदण्डों पर विचार किया जाता है.

1. व्यावसायिक वितरण :

अक्सर जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण की दृष्टि से राष्ट्रों को विकसित और अल्प-विकसित की श्रेणियों में रखा जाता है. यह आधार उपयोगी होते हुए भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता.

2. नीची प्रतिव्यक्ति आय :

संयुक्त राष्ट्र संघ ने अल्पविकसित देश उसे माना है जिसमें प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा पश्चिमी यूरोप की तुलना में कम है. लेकिन किसी देश का विकास अथवा अल्पविकास हमेशा प्रतिव्यक्ति आय के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि विश्व के अनेक अल्पविकसित देशों की प्रतिव्यक्ति आय भी विकसित देशों की भांति ऊँची है.

3. ‘गरीबी’ अल्प-विकास का प्रमुख कारण है :

आधुनिक अर्थशास्त्री अब विकास को ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं जिसके द्वारा गरीबी, आर्थिक असमानताओं और बेरोजगारी जैसे समस्याओं का निवारण हो सके. इस परिप्रेक्ष्य में अल्प-विकास एक अत्यंत दुःखदायी भौतिक व मानसिक स्थिति है. .

4. विकास की सम्भावनाएं और अल्पविकास :

जेकब वाइनर ने विकास की सम्भावनाओं के आधार पर अल्पविकास की परिभाषा दी है-“अल्पविकसित देश वह है जिसमें उपलब्ध पूँजी, श्रम शक्ति, प्राकृतिक साधनों आदि के अधिक उपयोग की काफी सम्भावनाएं है जिससे वर्तमान जनसंख्या के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा किया जा सके, और यदि प्रतिव्यक्ति आय पहले से ही अधिक है तो रहन-सहन के स्तर को नीचा किये बिना अधिक जनसंख्या का निर्वाह किया जा सके.

अल्पविकास के लक्षण

1. प्रतिव्यक्ति आय का नीचा स्तर और गरीबी :

प्रायः सभी अल्पविकसित देशों में प्रतिव्यक्ति आय बहुत कम है. स्पष्ट है कि इन परिस्थितियों में जनसंख्या का अधिकांश भाग बहुत गरीबी में जीवन यापन कर रहा है.

2. पूँजी का अभाव :

अल्पविकसित देशों में बचत और निवेश के स्तर नीचे होने के कारण पूँजी का संचय (Capital Formation) अधिक नहीं हो पाता.

3. जनसंख्या का भार :

अल्पविकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि की दर 2 से 4 प्रतिशत वार्षिक तक है. जो विकसित देशों की तुलना में काफी अधिक

4. कृषि पर निर्भरता :

अल्पविकसित देशों में लगभग 70 से 80 प्रतिशत तक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है लेकिन यहां कृषि विकास का स्तर बहुत नीचा होता है.

5. औद्योगिक पिछड़ापन :

अल्पविकसित देशों में अधिक उद्योग नहीं होते अतः अधिकतर लोग बेरोजगार तथा औद्योगिक ढाँचा भी पिछड़ा तथा असंतुलित होता है.

6. तकनीकी पिछड़ापन :

इन देशों में पूंजी के अभाव और श्रम की अधिकता के कारण नई तकनीकों का कम प्रयोग होता है.

7. आर्थिक असमानताएं :

विकसित देशों की तुलना में अल्पविकसित देशों में आय और सम्पत्ति के वितरण में असमानताएं अधिक होती हैं.

उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त इन देशों की कुछ अन्य विशेषताएं भी हैं. इन देशों के सामाजिक ढाँचे में रूढ़िवादिता (Traditional) आज भी देखी जा सकती है तथा सामाजिक-आर्थिक संबंधों में भी विशेष परिवर्तन नहीं दिखायी देता है.

आर्थिक विकास : कारक और युक्ति

A. आर्थिक विकास के कारक

आर्थिक विकास एक जटिल प्रक्रिया है. आर्थिक विकास के निर्धारक तत्व आर्थिक और अनार्थिक दोनों ही हैं.

आर्थिक कारक

किसी भी देश के आर्थिक विकास में आर्थिक कारकों को अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

1. पूँजी निर्माण :

आर्थिक विकास में उत्पादन के स्तर को बढ़ाने हेतु . पूंजी निर्माण सबसे महत्वपूर्ण कारक है. अतः आर्थिक विकास की गति को तेज रखने के लिए पूँजी निर्माण की दर ऊँची रखी जानी चाहिए.

2. मानव संसाधन :

आर्थिक विकास में जनसंख्या एक महत्वपूर्ण कारक है. यदि किसी देश में श्रम शक्ति कुशल होने के साथ कार्य क्षमता भी है तो उसकी उत्पादन सामर्थ्य निश्चय ही अधिक होगी.

3. कृषि का विक्रय अधिशेष :

देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ आवश्यक है कि कृषि के विक्रय अधिशेष में भी वृद्धि हो ताकि विकास के साथ बढ़ती खाद्यान्नों की मांग की पूर्ति आसानी से की जा सके.

4. विदेशी व्यापार की शर्ते :

विदेशी व्यापार से उन देशों को ही लाभ हुआ है जिन्होंने तेजी के साथ औद्योगीकरण कर निर्मित माल को ही विदेशी बाजारों में बेचा है. अतः अल्पविकसित राष्ट्रों के सामने भी यही लक्ष्य होना चाहिए.

5. आर्थिक प्रणाली :

आर्थिक विकास की दृष्टि से आर्थिक प्रणाली बहुत महत्वपूर्ण है. अल्पविकसित देशों के नियोजित विकास के लिए यह आवश्यक है.

अनार्थिक कारक

1. राजनैतिक स्वतंत्रता :

आर्थिक विकास के लिए राजनैतिक स्वतंत्रता आवश्यक है, क्योंकि आज तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि औपनिवेशिक शासन के अन्तर्गत किसी देश का आर्थिक विकास हुआ हो.

2. न्यायपूर्ण सामाजिक संगठन :

विकास प्रक्रिया तीव्र होने के लिए आवश्यक है कि देश के विकास कार्यक्रमों में सभी व्यक्तियों की भागीदारी हो और यह तभी संभव होगा जबकि सामाजिक संगठन न्यायपूर्ण हो.

3. तकनीकी ज्ञान एवं सामान्य शिक्षा :

जैसे-जैसे वैज्ञानिक व तकनीकी प्रगति होती है वैसे-वैसे अधिक उत्पादकता वाली तकनीकों का ज्ञान होता है. जिससे उत्पादन स्तर तेजी से बढ़ता है.

4. भ्रष्टाचार से मुक्ति :

अल्पविकसित देशों में व्याप्त भ्रष्टाचार का इनके आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव प्रड़ा है अतः भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना आवश्यक है ताकि आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न न हो.

5. विकास के लिए आकांक्षा :

प्रत्येक देश के आर्थिक विकास की प्रक्रिया की गति उस देश के लोगों की विकास के लिए आंकाक्षा पर निर्भर होती है.

B. आर्थिक विकास की युक्ति

इस सम्बन्ध में प्रधान रूप से दो विचारधाराएं है. रोजेन्स्टीन रोजान, नसे, रेग्नर आदि संतुलित विकास के समर्थक तथा हर्षमैन, सिंगर तथा पाल स्ट्रीटन असन्तुलित विकास प्रक्रिया के समर्थक हैं.

संतुलित विकास :

संतुलित विकास के पक्ष की सबसे अधिक तर्कसंगत व्याख्या नसें ने प्रस्तुत की है.

1. मांग की पूरकताएं और संतुलित विकास :

नर्से के शब्दों में, ‘‘अनेक पूरक परियोजनाओं में अधिक और अपेक्षाकृत श्रेष्ठ औजारों से काम करने वाले लोग एक दूसरे के ग्राहक बन जाते हैं. जनसाधारण के उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन करने वाले उद्योग इस अर्थ में पूरक होते हैं कि वे परस्पर बाजार उपलब्ध कराते हैं और इस प्रकार एक दूसरे की सहायता करते हैं. अन्तिम विश्लेषण तो आधारभूत पूरकता मनुष्य की आवश्यकताओं में विविधता से उत्पन्न होती है. “संतुलित आहार (balanced diet) यथार्थ में संतुलित विकास के पक्ष में तर्क का आधार है.”

2. कृषि और निर्माण उद्योगों के बीच संतुलन :

संतुलित आर्थिक विकास के लिए कृषि और निर्माण उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में विकास प्रक्रिया एक साथ चलनी चाहिए.

3. विनिर्माण उद्योग में सन्तुलन की आवश्यकता :

कृषि और उद्योगों के बीच संतुलन की भांति ही विनिर्माण उद्योग में होने वाले निवेशों में संतुलन होना चाहिए अन्यथा औद्योगिक विकास की गति बढ़ाना संभव नहीं होगा.

असंतुलित विकास :

संतुलित विकास सिद्धांत की आलोचना करते हुए एच.डब्ल्यू. सिंगर का कहना है कि इससे पिछड़े देशों में किसी प्रकार का विकास नहीं हुआ है. सभी अल्पविकसित देशों में विकास प्रक्रिया प्रारम्भ करने के समय पहले हो चुकने वाले आर्थिक विकास और निवेश सम्बन्धी पुराने निर्णयों को ध्यान में रखना होता है. नये निवेश अपने आप में संतुलित नहीं होते, और पहले से असन्तुलन के पूरक (Complementary) होने की दृष्टि से अर्थव्यवस्था को संतुलन की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं. परन्तु अर्थव्यवस्था में संतुलन न आकर पुनः नये असन्तुलन पैदा हो जाते हैं और फिर से पूरक निवेशों को प्रोत्साहन देते हैं. आर्थिक जीवन में यह प्रक्रिया चलती रहती है और आर्थिक विकास की गति को तेज रखती है.

हर्षमैन का विचार है कि आर्थिक विकास तेजी से संभव हो सके इसके लिए आवश्यक है कि आर्थिक ढांचे में जानबूझकर असंतुलन पैदा किए जाएं. विकास की दौड़ में पीछे रह जाने वाले उद्योगों को इससे विकास के लिए प्रेरणा मिलती है. यह वास्तविकता हर्षमैन के अनुसार विकास नीति का आधार होनी चाहिए. सिंगर के अनुसार एक बेहतर विकास युक्ति वह होगी जो उपलब्ध साधनों को ऐसे निवेश कार्यक्रमों में लगाए जिससे आर्थिक तंत्र और लचीला बने तथा बाजार व मांग के विस्तार से प्रेरित होकर वह और विस्तार कर सके.”

आर्थिक विकास में पूँजी, टेक्नोलॉजी और संस्थागत कारक

A. पूँजी निर्माण

किसी भी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की मात्रा और स्वरूप क्या होगा यह बहुत कुछ पूँजी की मात्रा पर निर्भर होता है. आर्थिक दृष्टि से पूँजी का अर्थ मशीन, प्लांट और उन बहुत सारी चीजों से होता है जिनकी सहायता से उत्पादन किया जाता हैं. अल्पविकसित देशों में इनकी कमी है. अल्पविकसित देशों में मांग और पूर्ति दोनों ही और के कारक इस ढंग से काम करते हैं कि वहां पूँजी निर्माण का स्तर नीचा रहता है.

1. अल्पविकसित देशों में पूँजी की पूर्ति

अल्पविकसित देशों में पूँजी की पूर्ति थोड़ी है. ओस्कार लेंगे (Oskar Lange) के अनुसार अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास की दृष्टि से बुनियादी बाधा यह है कि वहां पर प्राप्त आर्थिक आधिक्य (Economic Surplus) का प्रयोग पूँजी निर्माण के लिए नहीं होता है. आर्थिक आधिक्य से आशय कुल उपभोग पर कुल उत्पादन के आधिक्य से है.

प्रदर्शन प्रभाव और बचत प्रवृत्ति :

नर्से के अनुसार अल्पविकसित देशों में पूर्ति पक्ष की ओर से पूँजी निर्माण की सबसे बड़ी बाधा अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शन प्रभाव की है. जब नीची आय वाले वर्गों को ऊँची आय वाले वर्गों के विषय में जानकारी होती है तो ये अपने से ऊँचे वर्ग के लोगों की नकल करने की कोशिश में उपभोग पर व्यय बढ़ा देते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ठीक यही हो रहा है.

भुगतान संतुलन पर प्रभाव :

अमीर देश के सम्पर्क में रहने वाले गरीब देश हमेशा अपनी मौद्रिक आय तथा व्यय को अपनी उत्पादन क्षमता से ऊँचे स्तर पर रखने की इच्छा रखते हैं. इससे जहां एक ओर देश में मुद्रास्फ़ीति का दबाव बढ़ता है, वहां दूसरी ओर भुगतान संतुलन में घाटे की प्रवृत्ति स्थायी जाती है.

बचत संवर्धन और पूँजी की पूर्ति :

यदि अल्पविकसित देशों में हैं. की पूर्ति को पूरी तरह बाजार प्रणाली पर छोड़ दिया जाए तो ज्यादा बचत सं नहीं है लेकिन यदि सरकार ठीक प्रकार से हस्तक्षेप करे तो एक ओर तो व का स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है और दूसरी ओर विदेशी पूँजी को भी पान कर पाना संभव होता है.

‘प्रच्छन्न बेरोजगारी और पूँजी का पूर्ति’ :

कृषि प्रधान देशों में प्रच्छन्न बेरोजगारी का पाया जाना आम बात है. यदि प्रच्छन्न बेरोजगार लोगों को खेती से हटाकर पूँजी सम्बन्धी परियोजनाओं में लगाया जाए तो इससे राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि होगी, बशर्ते कि लोगों के उपभोग में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं होनी चाहिए.

कराधान :

अल्पविकसित देशों में जब लोग अपनी इच्छा से बचत नहीं करते तो कर ढांचा इस तरह से बनाया जाता है. कि उपभोग हतोत्साहित होता है और बचत को प्रोत्साहन मिलता है.

घाटे का वित्त प्रबन्धन:

घाटे के वित्त प्रबन्धन द्वारा सरकार राजस्व की तुलना में व्यय बढ़ाकर लोगों के उपभोग में कमी कर सकती है.

लोक ऋण, लघु बचते और सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा बचते :

पूँजी की पूर्ति को बढ़ाने के लिए सरकार आकर्षक योजनाओं के तहत ऋण लेती है तथा नयी-नयी योजनाओं के तहत लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित करती है.

विदेशी सहायता :

यदि घरेलू स्रोतों द्वारा पूँजी की पूर्ति को बढ़ाना सम्भव न हो तो दूसरे देशों और अन्तर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं से सहायता प्राप्त की जा सकती है बशर्ते कि ऋणभार ज्यादा न हो तथा विदेशी सहायता के साथ-साथ राजनीतिक दबाव नहीं आने चाहिए.

  1. अल्पविकसित देशों में पूँजी की मांग

विकास की आवश्यकता के सन्दर्भ में सभी अल्पविकसित देशों में पूँजी की मांग बहुत अधिक होती है. लेकिन इन देशों में बाजार की सीमितता के कारण निवेश-प्रेरणा अधिक नहीं है.

बाजार का आकार तथा निवेश प्रेरणा :

एड्म स्मिथ ने ‘Wealth of Nations’ में लिखा था कि “श्रम विभाजन बाजार के आकार के द्वारा सीमित होता है.” बाजार का आकार पूँजी निवेश से सम्बन्धित प्रेरणा को सभी तरह की अर्थव्यवस्था में प्रभावित करता है. उद्यमकर्ता हमेशा ही बाजार में वस्तु की मांग को ध्यान में रखकर निवेश करता है.

बाजार के आकार के निर्धारक तत्व :

बाजार के विस्तार द्वारा अल्पविकसित देशों में निवेश प्रेरणा को बढ़ाया जा सकता है ताकि गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ा जा सके.

कुछ लोग समझते हैं कि मौद्रिक विस्तार द्वारा बाजार को बढ़ाया जा सकता है लेकिन अल्पविकसित देशों में उत्पादिता कम होने के कारण वास्तविक क्रय-शक्ति कम होती है, इसे मुद्रा के विस्तार द्वारा बढ़ा पाना सम्भव नहीं है. सीमा शुल्क, कोटा प्रणाली, विनिमय नियंत्रण आदि को हटा लेने से भी व्यापार बढ़ सकता है और बाजार का विस्तार सम्भव है. व्यक्तिगत उत्पादक विज्ञापन तथा विक्रय कला द्वारा अपनी वस्तु की बिक्री के लिए बाजार तैयार करते हैं.

बाजार का आकार मुख्य रूप से उत्पादिता के स्तर पर निर्भर होता है. उत्पादिता के स्तर में सुधार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह (Flow) में वृद्धि होती है और उपभोग का स्तर भी ऊपर उठता है. अतः अल्पविकसित देशों में कृषि तथा उद्योग दोनों में ही उत्पादिता के स्तर में सुधार की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए.

B. टेक्नोलॉजी

आर्थिक विकास में तकनीकी ज्ञान की बहुत बड़ी भूमिका है.

अल्प-विकसित देशों में वर्तमान टेक्नोलॉजी :

अल्पविकसित देश आज भी तकनीकी दृष्टि से बहुत पिछड़े हैं. विकसित देशों की तुलना में इन ओं में आज भी अधिकतर कार्य परम्परागत विधियों द्वारा किये जाते हैं.

किसी भी अल्प-विकसित देश के लिए सही तकनीक का चुनाव एक महत्वपूर्ण सवाल है. अधिक जनसंख्या वाले देश में श्रम प्रधान तकनीक को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि लोग रोजगार पर लगे रहे. लेकिन कौन सी तकनीक अपनायी जाये यह प्रत्येक देश की विकास नीति पर निर्भर करता है.

बीच की टेक्नोलॉजी :

अनेक अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि अल्पविकसित देशों को बीच की तकनीक अपनानी चाहिए. यदि ये देश विकसित देशों की तकनीक अपनाना चाहें तो एक ओर पूँजी की कमी का सामना करना पड़ेगा, दसरी और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा पैदा हो जायेगा. वास्तविक रूप में परिस्थितियां यह तय करती हैं कि कौन सी टेक्नोलॉजी ठीक है. इस दृष्टि से अल्पविकसित देशों में, जहां श्रम की अधिकता है, कोई भी तकनीक जो श्रम को पूँजी से प्रतिस्थापित करती है उपयुक्त नहीं मानी जा सकती.

C. संस्थागत कारक

सभी देशों में अनेक प्रकार की आर्थिक संस्थाएं पायी जाती हैं. हम निम्न तीन संस्थाओं की चर्चा यहां करेंगे.

बाजार संगठन :

आधुनिक मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र बहुत बड़ा होता है इनमें जो कुछ निर्णय लिये जाते हैं और उनके आधार पर जो क्रिया कलाप होते हैं उनका बाजार से सीधा सम्बन्ध होता है. बाजार संगठन अच्छा होने पर देश में एक सी कीमतें होती हैं तथा इससे साधनों का आवंटन (Allocation) विवेकपूर्ण (Rational) होता है. परन्तु जब आय असमानताएं अधिक होती हैं तो बाजार संगठन अच्छा होते हुए भी साधनों का उचित आबंटन नहीं होता. अल्पविकसित देशों में बाजार संगठन प्रायः अच्छा नहीं है.

आर्थिक आयोजन :

आज आर्थिक विकास के लिए अनेक अल्पविकसित देशों में आर्थिक आयोजन का सहारा लिया जाता है. इसके अन्तर्गत राष्ट्र की आवश्यकताओं और साधनों को ध्यान में रखकर विभिन्न लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं और फिर उन्हें प्राप्त करने के लिए सुनिश्चित उपाय किये जाते हैं. इसलिए जब इन्हें प्राप्त करने के लिए काम किया जाता है तो सफलता की संभावना ज्यादा होती है और लोगों की आकांक्षाएं पूरी होने से उनकी विकास में दिलचस्पी बढ़ सकती है.

आर्थिक एजेंसियां :

सुसंगठित बाजार और आर्थिक आयोजन के साथ-साथ वित्त व्यवस्था करने वाली, विपणन में सहायता पहुंचाने वाली, बैंकिंग व्यवस्था

और बीमा कंपनियों का भी आर्थिक विकास में बहुत महत्व है. अल्पविकसित देशों में ये संस्थाएं स्थापित हुई है, लेकिन इनका फैलाव थोड़ा है. अतः इनकी सफलता के लिए सरकार को पहल करनी होगी और लोगों की भागीदारी भी आवश्यक होगी.

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